- SCERT रायपुर में नवीन पाठ्य-पुस्तक आधारित कार्यशाला में स्थानीय विरासत, वन संपदा और रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर हुआ मंथन
रायपुर, 24 जुलाई , राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), रायपुर में 21 जुलाई 2026 से 24 जुलाई 2026 तक नवीन पाठ्य-पुस्तक आधारित कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इसमें एस ई आर टी के संचालक आई ए एस ऋतु राज रघुवंशी जी के मार्ग दर्शन में चार दिवसीय कार्यशाला आयोजित किया जा रहा है.
कार्यशाला में छत्तीसगढ़ के संदर्भों को नवीन पाठ्य-पुस्तकों में प्रभावी रूप से समाहित करने पर विशेष चर्चा की जा रही है।
कार्यशाला में सी.वी. रमन विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अरविंद तिवारी ने “छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं कौशल विकास” विषय पर अपने विचार रखते हुए प्राचीन कला, लोक संस्कृति तथा वैज्ञानिक तथ्यों के समन्वय पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को स्थानीय सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना समय की आवश्यकता है।
कौशल एवं व्यावसायिक दक्षता विषय के प्रभारी समन्वयक नरेन्द्र जांगड़े ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध वन संपदा, उसके संरक्षण, दैनिक जीवन में उसकी उपयोगिता तथा आत्मनिर्भरता से उसके संबंध पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यशाला के टीम सदस्य कीर्तन लाल बंजारे ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति, पर्यटन और रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य के प्रमुख पुरातात्विक एवं पर्यटन स्थलों—चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, भोरमदेव मंदिर तथा रतनपुर महामाया मंदिर—को नवीन पाठ्य-पुस्तकों में समुचित स्थान दिए जाने की आवश्यकता और महत्त्व पर बल दिया।
समिति के सदस्य डॉ. अनुपम तिवारी, राहुल वर्मा, शिवनारायण वर्मा, ताराचंद जायसवाल तथा श्रीमती एस. प्रतिमा ने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बाँस आधारित विभिन्न कला एवं हस्तशिल्प वस्तुओं के निर्माण तथा उनसे जुड़े कौशल विकास एवं रोजगारोन्मुखी कार्ययोजनाओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यशाला का संचालन डॉ. आर. एस. चौहान द्वारा किया गया। कार्यक्रम में SCERT के सहायक संचालक कौस्तव चटर्जी, दानी राम वर्मा, दिलीप केशरवानी तथा उप कुलसचिवअमित जायसवाल सहित अन्य गणमान्य प्रतिभागी उपस्थित रहे।
कार्यशाला का उद्देश्य छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक संसाधनों, लोककला, कौशल विकास तथा पर्यटन की संभावनाओं को नवीन पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से विद्यार्थियों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाना है, ताकि शिक्षा स्थानीय संदर्भों से जुड़कर अधिक व्यावहारिक, रोजगारोन्मुखी और समृद्ध बन सके
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