- कार्यक्रम की शुरुआत प्रख्यात कलाकार एवं फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हुई।
लखनऊ | प्रदेश की राजधानी स्थित 115 वर्ष पुराने कला महाविद्यालय में बनारस चित्रकला घराने की छठवीं और सातवीं पीढ़ी के चित्रकार डॉ. गोपाल प्रसाद एवं अंकित प्रसाद के साथ कला संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रख्यात कलाकार एवं फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हुई।
कार्यक्रम में बनारस चित्रकला घराने और उसके कलाकारों पर बनी दो वृत्तचित्र फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। भारत सरकार के फिल्म डिवीजन द्वारा 1978 में तथा दूरदर्शन द्वारा 2022 में निर्मित इन फिल्मों में घराने के इतिहास, विभिन्न पीढ़ियों और उसकी चित्रकला परंपरा को प्रस्तुत किया गया है।

डॉ. गोपाल प्रसाद ने बनारस चित्रकला की पारंपरिक लघुचित्र तकनीक, चित्र निर्माण की प्रक्रिया तथा विभिन्न पीढ़ियों के कलाकारों के योगदान पर विस्तार से जानकारी दी। सातवीं पीढ़ी के चित्रकार अंकित प्रसाद ने पारंपरिक मुगल शैली के साथ अपने समकालीन प्रयोगों और इस कला परंपरा को आगे बढ़ाने के प्रयासों को साझा किया।
कला महाविद्यालय के डीन डॉ. रतन कुमार ने कलाकारों का सम्मान एवं आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पारंपरिक कला विधाओं के कलाकारों के साथ विद्यार्थियों का प्रत्यक्ष संवाद आवश्यक है। उन्होंने बताया कि महाविद्यालय में पिछले कई वर्षों से कलाकारों के साथ संवाद, परिचर्चा एवं कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं और विभिन्न विधाओं के कलाकारों को विद्यार्थियों से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है।

इस अवसर पर भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने कहा कि 18वीं सदी से विकसित बनारस चित्रकला परंपरा लगभग तीन सौ वर्षों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। मुगल लघुचित्र शैली के प्रभाव के साथ बनारस के जीवन, संस्कृति और स्थापत्य की झलक इस शैली को विशिष्ट बनाती है। उन्होंने कहा कि आज घराने के कलाकार अपनी परंपरा को जीवित रखने के साथ उसे व्यापक जनमानस और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। इस क्रम में महिला चित्रकार वंश श्री का योगदान भी उल्लेखनीय है।
कलाकारों ने बताया कि इस परंपरा में चित्रकार बनने की प्रक्रिया वर्षों की साधना और अनुशासन से जुड़ी है। बचपन से ही पिता गुरु के रूप में रेखांकन, रंग-तैयारी और ब्रश संचालन का अभ्यास कराया जाता है। प्रतिदिन अभ्यास और लगभग 15–20 वर्षों की निरंतर साधना के बाद कलाकार को सूक्ष्म रेखांकन पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त होता है। चित्रांकन से पूर्व ब्रश को मस्तक से स्पर्श करना तथा “जय गणपति बाबा की” का स्मरण करने की परंपरा को ‘कामनाधाना’ कहा जाता है।

कार्यक्रम का संचालन कला शिक्षिका पल्लवी सिंह ने किया। इस अवसर पर रवि कांत पांडेय, दिनेश कुमार, सुमित कुमार, संजय राज, पूनम जायसवाल, रीना गौतम, संध्या यादव, अजय कुमार, अमर नाथ गौड़, श्रेयांशी, महती वशिष्ठ एवं ख़ुर्शीद ज़ेहरा सहित शिक्षक-शिक्षिकाएं और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। वक्ताओं ने कहा कि विलुप्त होती पारंपरिक कलाओं के संरक्षण के साथ उनके कलाकारों, तकनीकों, परंपराओं और मौखिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण भी जरूरी है। ऐसे कला संवाद इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं।
