लखनऊ , 20 अप्रैल .लखनऊ विश्वविद्यालय (University Of Lucknow ) के कुलपति प्रोफेसर जेपी सैनी द्वारा विश्वविद्यालय के द्वितीय परिसर में प्रशासनिक फेरबदल के बाद अब मुख्य परिसर में भी कुछ अहम पदों पर बदलाव की संभावनाएं जताई जा रही है. इनमें सबसे पहले के प्राक्टर प्रोफेसर राकेश द्विवेदी के साथ कई वार्डन प्रमुख रूप से शामिल हैं .इसके लिए विकल्पं की तलाश भी शुरू हो गयी है .तलाश पूरी होने के बाद बदलाव किया जाएगा .
विश्वविद्यालय (University Of Lucknow ) में आउटसोर्सिंग कर्मचारी की उपस्थिति, भुगतान से जुड़े मामलों को लेकर विवाद आने के बाद प्राक्टोरियल बोर्ड में फेरबदल की तैयारी है. कुलपति प्रोफेसर सैनी प्रशासनिक और शैक्षिक कामकाज में अनुभवी माने जाते हैं . इसलिए भी फेरबदल जल्दबाजी में नहीं करते हैं बल्कि इसके पर्याप्त आधार और होने वाले नफा नुकसान का आकलन करने के बाद ही आगे कदम बढ़ाते हैं . लखनऊ विश्वविद्यालय के द्वितीय परिसर में छात्रावास की मेस की शिकायतें और परिसर (University Of Lucknow ) में अनुशासनहीनता से जुड़े ऐसे कई गंभीर मामले आए हैं, जिनसे विश्वविद्यालय की छवि प्रभावित हुई है परिसर में कानून व्यवस्था ऐसी रही कि ए दिन मारपीट, शिक्षकों को धमकी और पढ़ाई लिखाई में व्यवधान जैसी कई घटनाएं हुई हैं . इसे सुधारने के लिए भी वहां प्राक्टोरियल बोर्ड को पर्याप्त समय दिए जाने के बावजूद जब स्थिति नहीं सुधरी तो प्रोफेसर सैनी खुद पहुंचे और खुद आकलन करने के बाद द्वितीय परिसर में फेरबदल किया वार्डन भी हटाए गए और प्राक्टोरियल बोर्ड में भी फेरबदल किया गया.
अब इसके आगे परिणाम आने वाले हैं, लेकिन यह बदलाव यही तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि मुख्य परिसर के प्राक्टोरियल बोर्ड में भी फेरबदल होना तय माना जा रहा है. लंबे समय से प्राक्टोरियल बोर्ड के सदस्य शिक्षक अब पहले जैसी गंभीरता प्रशासनिक दक्षता के साथ काम नहीं कर रहे हैं जबकि समय और विश्वविद्यालय की जरूरत के अनुसार प्रॉक्टोरियल बोर्ड के सदस्यों को अनुशासित और त्वरित फैसले लेने में सक्षम होना चाहिए लेकिन कई घटनाओं से साफ है कि विश्वविद्यालय में अनुशासनहीनता से जुड़े धरना प्रदर्शन की संख्या बढ़ रही है. कुलपति कार्यालय, रजिस्ट्रार कार्यालय से लेकर के परिसर में कहीं भी धरना प्रदर्शन हो रहे हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय (University Of Lucknow ) के मुख्य परिसर में कई ऐसे विवाद हैं जिन्हें समय रहते नियंत्रित किया जा सकता था लेकिन प्राक्टोरियल बोर्ड के सदस्यों ने तत्परतापूर्वक कदम नहीं उठाया और न समाधान के लिए काम किया .
कई छात्र संगठनों ने मोर्चा बनाकर विश्वविद्यालय (University Of Lucknow ) की छवि धूमिल की है . इन नेताओं और बारादरी के एक ऐसे मुद्दे को उठाया जो विश्वविद्यालय परिसर में ना कभी उठा और न ही वास्तव में मुद्दा है. लेकिन इसे हवा मिली और प्राक्टोरियल बोर्ड असहाय दिखा ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि विश्वविद्यालय (University Of Lucknow ) में प्राक्टोरियल बोर्ड के रूप में ऐसा तंत्र होना चाहिए जिसमें किसी संगठन किसी व्यक्ति के प्रभाव से रहित होकर प्रशासनिक दक्षता और समय अनुकूल फैसले लेने के लिए तत्पर दिखाई देता हो कहने के लिए तो मुख्य परिसर (University Of Lucknow ) में लंबी चौड़ी प्राक्टोरियल बोर्ड की टीम है लेकिन अगर आप एक-एक सदस्य के कामकाज का मूल्यांकन करेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी . इसलिए अब प्रशासनिक स्तर पर यह महसूस किया जा रहा है कि प्राक्टोरियल बोर्ड का पुनर्गठन कर एक मजबूत और स्थाई तंत्र को पुनः व्यवस्थित और स्थापित किया जाए ताकि विश्वविद्यालय (University Of Lucknow ) में सामान्य अनुशासन और शैक्षिक माहौल बनाए रखने में मदद मिले .
ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि नए सत्र के प्रारंभिक दौर में अभी प्रवेश प्रक्रिया शुरू हुई है और विभिन्न छात्र संगठन अपनी नेतागिरी करने के लिए सक्रिय हो रहे हैं, तब उन्हें नियंत्रित करना विश्वविद्यालय के लिए न केवल मुश्किल होगा बल्कि नए आने विद्यार्थियों के जेहन में भी एक ऐसी छवि बनेगी जो विश्वविद्यालय (University Of Lucknow ) के लिए उपयुक्त नहीं होगी .
