
एटा.(उप्र). प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सशक्त भारत के निर्माण के लिए दिये गए मंत्र ‘वोकल फॉर लोकल’ को विस्तृत आयाम में देखने की जरूरत है। प्राचीन काल से भारत न सिर्फ वस्तु व्यापार में अपनी स्थानीय वस्तुओं के लिए जाना गया है बल्कि भारत की विशिष्ट समृद्ध ज्ञान परंपरा ने विश्व को मानवता,सहिष्णुता, शांति और प्रेम का मार्ग दिखाया है।
यह विचार नव नालंदा महाविहार (समविश्वविद्यालय) बिहार के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विजय कर्ण ने व्यक्त किए। वे 26 जून 2021 को आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चयन प्रकोष्ठ, जवाहर लाल नेहरू पी.जी. कालेज, एटा, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में चौरीचौरा शताब्दी समारोह के अंतर्गत आयोजित वोकल फॉर लोकल : सशक्त भारत की ओर बढ़ते कदम” विषयक राष्ट्रीय वेबीनार को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। विषय का प्रवर्तन राजनीतिशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ रत्नेश कुमार मिश्र ने किया।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर विजय कर्ण ने आगे कहा कि आधुनिक पश्चिमी उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद, संरक्षणवाद पूँजीवाद और बाजारवाद पर टिके विश्व में जिस तरह की गला-काट प्रतिस्पर्धा चल रही है इसमें मनुष्य को मनुष्य के रूप में न देखकर उसे एक संसाधन के रूप में देखने की दृष्टि विकसित हुई है। इस दौर में या तो आप क्रेता हैं या विक्रेता और दोनों भूमिकाओं में दोनों एक-दूसरे को ठगने में लगे हैं। जो जितना दूसरे को ठग ले उसे उतना ही सफल माना जा रहा है। मनुष्य को लेकर यह जीवन दृष्टि भारत की कभी नहीं रही। भारत ने सदैव “आत्मवत् सर्वभूतेषु” अर्थात् अपने जैसा सभी को मानने की बात कही है। हमारी प्रस्थापना विश्व को “वसुधैव कुटुंबकम्” के रूप में देखने की रही है। उन्होंने खानपान में पिजर्वेटिव खाद्य पदार्थों के स्थान पर रीजनल, सीजनल और न्यूट्रिशनल खाद्य पदार्थों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके माध्यम से भी वोकल फॉर लोकल अभियान को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
स्वामी दयाधीपानंद जी महाराज ने बताया ‘इंटीग्रेटेड वेलनेस’
कार्यक्रम की अध्यक्षता रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम (हॉस्पिटल), कनखल,हरिद्वार के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक स्वामी दयाधीपानंद जी महाराज ने किया। उन्होंने स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के जीवन के उदाहरणों से श्रोताओं का मार्गदर्शन किया। उन्होंने वोकल फॉर लोकल अभियान के माध्यम से किस तरह भारतीय ज्ञान-विज्ञान विशेष तौर पर अध्यात्म, योग और ध्यान से ‘इंटीग्रेटेड वेलनेस’ को विश्व के हितार्थ आगे बढ़ाया जा सकता है इस पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सामान्य रूप से लोग शरीर के स्वास्थ्य को ही समग्र स्वास्थ्य मान बैठते हैं किंतु शारीरिक स्वास्थ्य केवल अन्नमय कोश तक सीमित है । इसके अतिरिक्त हमें अपने प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश को भी स्वस्थ रखने की जरूरत है।
प्राचार्य डॉ. सक्सेना ने जताया आभार
कार्यक्रम के अंत में महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ सुनीता सक्सेना ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार द्विवेदी, जवाहर लाल नेहरू कालेज के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ भूपेन्द्र सचान, अर्थशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ प्रवेश पाण्डेय, महाविद्यालय के विद्यार्थिगण तथा विभिन्न प्रदेशों के श्रोतागण आभासी पटल पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन महाविद्यालय की अर्थशास्त्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ जया गुप्ता और राजनीति शास्त्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ नीलम गुप्ता ने किया।
