आठ पहर यूॅ ही गया, माया, मोह, जंजाल ।
राम नाम हृदय नहीं, जीत लिया जम काल ।।
✍ मनुष्य ऐसे व्यवहार करता है जैसे वह अजर-अमर है ।
✍ उसका अहम (मै) उसको अपनी गलतियों को स्वीकार ही नही करने देता ।
✍ जबकि वह जानता है कि गलतियों में सुधार ही उसको (राम) श्रेष्ठ बनाने की ओर अग्रसर करेगा।
✍ माया-मोह में इतना लिप्त/व्यस्त है कि कहेगा मरने की भी फुर्सत नहीं है ।
✍ मरने का समय आ जाए तो ईश्वर से अतिरिक्त समय मांगने हेतु, अपना स्तर,भिखारी से भी नीचे गिरा लेता है ।
