- प्रोफेसर मनोज पांडेय कोई नई नवेले शिक्षक नेता नहीं है अपितु दशकों से शिक्षक की राजनीति में हैं वह एक शिक्षक नेता की गरिमा के अनुरूप भी आचरण करते हैं . फैसले लेते हैं और उन फैसलों में डिग्री कॉलेज के शिक्षकों और छात्रों के हित समाहित होते हैं,
- कुलपति प्रोफेसर सैनी के सहयोगी भी असमंजस में
लखनऊ , 31 मई , लखनऊ विश्वविद्यालय संयुक्त महाविद्यालय शिक्षक संघ ( लुआक्टा – LUACTA ) के अध्यक्ष प्रोफेसर मनोज पांडेय और महामंत्री प्रोफेसर अंशु केडिया शिक्षक हितों शिक्षा हितों, विश्वविद्यालय हितों के लिए ही हमेशा सक्रिय रहते हैं . नए कुलपति प्रोफेसर जेपी सैनी को उन्होंने लुआक्टा की कार्य समिति की बैठक के महत्वपूर्ण निर्णय से उन्हें अवगत कराया और उन्हें ग्रीष्म अवकाश सहित परीक्षा संचालन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर सुझाव भी दिया , कुलपति प्रोफेसर सैनी ने सुझावों से सहमति भी जताई लेकिन जब रजिस्ट्रार डॉक्टर भावना मिश्रा ने आदेश निकाला तो लुआक्टा द्वारा दिए गए सभी सुझाव नकार कर दिए गए.
ऐसे ही रजिस्ट्रार डॉक्टर भावना मिश्रा ने विश्वविद्यालय कर्मचारी परिषद की निर्वाचित कार्य समिति को न केवल भंग कर दिया बल्कि चुनाव कराने की भी घोषणा कर दी , जबकि ऐसे फैसले विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार या कुलपति द्वारा फैसला न लेकर कर्मचारी परिषद द्वारा ही फैसले लिए जाते हैं . आखिर लखनऊ विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) के कुलपति प्रोफेसर जेपी सैनी डिग्री कॉलेज शिक्षकों ( लुआक्टा) और विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को नाराज करके किस प्रकार से विश्वविद्यालय में सकारात्मक शैक्षिक और प्रशासनिक व्यवस्था को सुनिश्चित करने में प्रयास कर रहे हैं . जबकि प्रोफेसर जय प्रकाश सैनी को शिक्षा, अनुसंधान और विश्वविद्यालय प्रशासन में 38 वर्षों से अधिक का विशिष्ट अनुभव है।

यह सवाल केवल कॉलेज के शिक्षकों के बीच ही नहीं बल्कि अब लखनऊ विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसरों के बीच भी गूंज रहा है . इसकी वजह यह है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रोफेसर जेपी सैनी लगातार विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) में प्रशासनिक कामकाज की दृष्टि से नए नए संकटों का सामना कर रहे हैं . इसमें चाहे द्वितीय परिसर में छात्राओं का आंदोलन हो या शिक्षक द्वारा छात्रा का शोषण करने की बात हो , परीक्षाओं में अव्यवस्था हो या फिर फीस वृद्धि जैसे मुद्दों पर परिसर में धरना प्रदर्शन, हंगामा नारेबाजी और लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन की बात . लखनऊ विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) पिछले कई दिनों से इन्हीं सब कारणों से सुर्खियों में है जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय में इस समय प्रवेश प्रक्रिया चल रही है, देश-विदेश के छात्र यहां प्रवेश लेने के लिए प्रयासरत हैं और विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) छात्रों का नामांकन को बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश भी कर रहा है , लेकिन परिसर के इस माहौल में पढ़ाई लिखाई , शोध जैसे महत्वपूर्ण कार्य किस प्रकार होंगे ?
इसका जवाब शायद विश्वविद्यालय प्रशासन ( Lucknow University ) के पास नहीं है ? परीक्षाएं तो ऐसे हो रही हैं जैसे शिया डिग्री कॉलेज सहित कॉलेज में छात्राएं बीमार हो रही है. भीषण गर्मी में परीक्षाओं का संचालन तो हर बार होता है, लेकिन परीक्षाओं के संचालन की उचित व्यवस्था को सुनिश्चित करना भी विश्वविद्यालय का प्रमुख कार्य है, लेकिन क्या यह हो पा रहा है ? यह बड़ा सवाल डिग्री कॉलेज शिक्षक संघ ( लुआक्टा ) को परेशान कर रहा है.लुआक्टा के अध्यक्ष प्रोफेसर मनोज पांडेय का साफ कहना है कि लुआक्टा की बातें और सुझाव विश्वविद्यालय प्रशासन नहीं मान रहा है. प्रोफेसर मनोज पांडेय कोई नई नवेले शिक्षक नेता नहीं है अपितु दशकों से शिक्षक की राजनीति में हैं वह एक शिक्षक नेता की गरिमा के अनुरूप भी आचरण करते हैं . फैसले लेते हैं और उन फैसलों में डिग्री कॉलेज के शिक्षकों और छात्रों के हित समाहित होते हैं, लेकिन न जाने क्यों लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन ( Lucknow University ) लुआक्टा के सुझाव और मांगों को अनदेखा ही नहीं कर रहा है बल्कि उन्हें अपमानित करने जैसी स्थिति में लाकर खड़ा कर रहा है .

लखनऊ विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) में नए कुलपति के आगमन के साथ यह उम्मीद बंधी थी कि पूर्ववर्ती कुलपति प्रोफेसर आलोक कुमार के कार्यकाल में शिक्षकों- विद्यार्थियों को सताए जाने वाले फैसले वापस होंगे, शैक्षिक अनुकूलता का माहौल बनेगा . डिग्री कॉलेज में शिक्षकों के प्रमोशन , वेतन विसंगतियों , और जुड़े प्रबंधन से सताए हुए शिक्षकों को न्याय मिलेगा लेकिन यह काम पीछे छूट गए और विश्वविद्यालय में छात्रों के धरना प्रदर्शन से लेकर कर्मचारी परिषद की निर्वाचित कार्यकारिणी भंग तक करने जैसे फैसले हुए हैं . यह सवाल अहम है कि लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन ( Lucknow University ) को विश्वविद्यालय कर्मचारी परिषद की निर्वाचित कार्यकारिणी भंग करने से क्या लाभ हुआ ? क्या माहौल सुधर गया ? क्या विश्वविद्यालय के कर्मचारियों में काम करने की क्षमता अधिक बढ़ गई या विश्वविद्यालय में ऊर्जा संवर्धन का कार्य तेज हो गया ?
आखिर कौन सी वजह है जिसे विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) ने कर्मचारी परिषद को खत्म करने का फैसला लिया और उसे फैसले से विश्वविद्यालय ( Lucknow University ) का क्या हित हुआ ? हर एक फैसले के पीछे कोई ठोस कारण होता है और उसे कारण का परिणाम भी दिखना चाहिए . कम से कम लखनऊ विश्वविद्यालय में तो यह नहीं दिख रहा है उल्टे कर्मचारियों का नुकसान ही हो रहा है > मृतक आश्रित में तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के लायक की पात्रता रखने वाले मृतक आश्रितों को चपरासी की नियुक्ति दी गई है आखिर यह कैसे और क्यों हो रहा है ? इसका जवाब निर्वाचित कार्यकारिणी के पदाधिकारी से पूछने का सवाल ही नहीं क्योंकि विवि प्रशासन की नजर में वे तो कर्मचारी परिषद के पदाधिकारी भी नहीं बचे हैं . विश्वविद्यालय की नजर में लुआक्टा संग ऐसे हालात में बने हैं कि माहौल सकारात्मक नहीं दिख रहा है,
Campus Samachar | lucknow University : यह सवाल अहम है कि लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन ( Lucknow University ) किस प्रकारकी आगे की दिशा और दशा को तय करने वाला है ? विश्वविद्यालय के तमाम शिक्षक, छात्र और डिग्री कॉलेज के शिक्षक वर्तमान पीड़ा में गुजर रहे हैं . विश्वविद्यालय प्रशासन पर टिप्पणी करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर का कहना है कि हालात बदलते नहीं दिख रहे हैं शायद आने वाले दिन बेहतर होने वाले हो इसलिए ऐसा हो रहा है .
