- बाघ , चीता भी कभी कभी आते है 2 वर्ष पहले आए थे तो जंगल में एक किसान के गौठान में 8 या 12 बछड़ा व गाय को काटकर मृत कर दिए थे। लकड़बग्घा तो चलता फिरता रहता है और बकरी को आय दिन खाते रहते है।
- आश्रित ग्राम- बगबुडापारा, बंजारीडॉड, अलगीडोंगरी, बरभाठा, लरला (राजस्व ग्राम), जिल्दा (राजस्व ग्राम) पारा टोला -भदरापारा, लाइनपारा,बलदेवपारा, बाराजोरी, कोटेशर,कमरू डिहारी,बाजारपारा , जलाशय के उस पार खोपखर्रा, सामरभुजा, रनई गांव हैं
रायपुर , 18 जून , Campus Samachar.com लोक कल्याणकारी कार्यों और मूलभूत सुविधायें उपलब्ध कराने के लिए योजनाएं बनती हैं और उन पर अमल भी होता है, लेकिन जरूरी नहीं है कि वह हर एक व्यक्ति और हर एक गांव या शहर के लिए सुविधा लेकर आयें और उनके दुख दर्द को समझें .
ऐसे सुविधा विहीन गांव और शहरों की संख्या अनगिनत है . आजादी के कई दशक बाद भी विकास की लहर से तमाम गांव अछूते हैं . दैनिक कार्यों -स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए उन्हें मैराथन दौड़ लगानी ही पड़ती है . धन, श्रम भी अधिक ही लगता है लेकिन उनकी बसावट कहें या फिर भौगोलिक स्थितियां या फिर सरकार की लाचारगी और भ्रष्टाचार में लिप्त योजनाएं, इन गांव से विकास अछूत ही है
आज हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले का बगबूड़ा गांव . यह कोरबा जिला में स्थित है .ग्राम पंचायत साखो है और इसके आश्रित ग्राम- बगबुडापारा, बंजारीडॉड, अलगीडोंगरी, बरभाठा, लरला (राजस्व ग्राम), जिल्दा (राजस्व ग्राम)
पारा टोला – भदरापारा, लाइनपारा,बलदेवपारा, बाराजोरी, कोटेशर,कमरू डिहारी,बाजारपारा और जलाशय के उस पार,,,, खोपखर्रा, सामरभुजा, रनई गांव हैं.
आज हम बात कर रहे हैं ग्राम बगबूड़ा की . इस गांव में विकास की किरणें अन्य गांव की तरह नहीं पहुंची हैं. शिक्षा स्वास्थ्य के लिए यहां के ग्रामीण परेशान हैं .आवागमन के साधनों की दुर्लभता इनके जीवन को सीमित कर रही है . पानी , पहाड़ से घिरे इस गांव से निकलना और गांव पहुंचना किसी किले जैसी जीत से कम नहीं लगता है. पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के भूगोल विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर पीएल चंद्राकर जी कहते हैं कि गांव तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने ही चाहिए . कारण कैसे भी हों , उन्हें दूर करने का रास्ता भी निकल ही आता है.
Korba Village Life : गांव के शिक्षक फेरु लाल साहू बताते हैं कि इस गांव में पहुंचने के लिए लोग नाव का सहारा लेते हैं , डोंगी से पार करते हैं और उन्हें इसके लिए नाविक द्वारा किराया भी देना पड़ता है. इए निजी होती हैं और उनका किराया भी निजी होता है . भेड़ बकरी से लेकर साइकिल -मोटरसाइकिल तक इसी ढोंगी से पार कराई जाती है और उसका किराया भी वसूला जाता है . यहाँ किसी की सिफारिश नहीं चलती है . सरपंच पंच या किसी के भी व्यक्ति हो लेकिन आपको किराया तो देना ही पड़ेगा . जिंदगी का सफर नावों में या तैर कर चल रहा है, पढ़ाई और लिखाई की बात तो यहां के लोगों के लिए एक सपना की तरह ही है , लेकिन उत्साह ही जीवन बहुत कुछ हासिल करने के लिए बहुत कुछ करता है. वैसे ही यहां के युवा न केवल अपने जीवन को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं , बल्कि वे इंतजार में भी है कि शायद विकास की किरणें कभी उन तक पहुंचेंगईं जब उनका गांव भी कोरबा जिले की सीमा से ऊपर उठकर राज्य के विकास में भी अपना योगदान देगा ,

प्रोफेसर चंद्राकर बातचीत में रहते हैं कि गांव के विकास की मूलभूत योजनाएं बनाते समय उसकी भौगोलिक स्थिति का विशेष ध्यान रखने की जरूरत है , अगर भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाती हैं तो निश्चित तौर पर लोगों का विकास होगा . प्रोफेसर चंद्राकर की नजर में गांव के विकास के लिए स्थानीय सरकार अधिक बेहतर प्रयास कर सकती हैं और इसमें जनप्रतिनिधि भी इसमें प्रयास कर सकते हैं,
शादी विवाह अशिक्षा तथा आवागमन से दूर होने के कारण अभी भी कम उम्र में शादी हो जाता है। शासन भी ज्यादा प्रभावशाली नहीं है, कुछ लोग वातावरण को देखते हुए जल्दी शादी कर देते है। स्वस्थगत समस्या होता है कम उम्र में ही बीमार हो जाते है। इस गांव में दहेज में अभी एक क्षेत्र में कोई लेनदेन नहीं है अपनी अपनी इच्छा अनुसार ही देते है। बस खाना पीना पूरे गांव को खिलते है , खाना में बकरा मुर्गा अनिवार्य रहता है। शादी अभी भी 20-30 हजार में हो जाती है। यहाँ के कई लोगों के पास रिकॉर्ड में जमीन नहीं है सब कब्जे की भूमि स्वामी है.
जानिये वोट देने कैसे जाते हैं ?
मतदान दल कोरबा तरफ से घूमकर आते है या विकास खण्ड से एक रास्ता है जो कि बागों बांध से होते हुए अजगरबाहर होकर 85 किलोमीटर है , उस रास्ते से आते है। विकास खण्ड के सभी अधिकारी निरीक्षण अवलोकन में अधिकतर नाव से ही जाते है अचानक कभी कोरबा से घूमकर आते है। पंच सरपंच लोग मीटिंग के लिए नाव से आना जाना करते हैं . बाजार पहले पैदल चलते हैं फिर नाव पार करते हैं फिर 9 किलोमीटर पैदल चलते हैं, 5 किलोमीटर बस से जाते हैं वैसे ही लौटते हैं विकासखंड मुख्यालय के लिए भी इसी तरह करना पड़ता है पर वह 50 किलोमीटर दूर है .
एक व्यक्ति 30, मोटरसाइकिल 30, बकरी गाय का भी 30,40
नाव चलाने वाले बतातें हैं यहाँ तो भैंस, बड़ा बैल को तैराकर पार करवाते है। रस्सी को नाव में बैठकर पकड़े रहते है। पैसा लेते 50- 100 देखकर लेते है, हाथी भी जब भी इधर विचरण करते है तो तैरकर पार करते है । सूंड को ऊपर किए रहते है और तैरते रहते है। बच्चा हाथी के सूंड को बड़ा हाथी सूंड में पकड़ कर ऊपर रखे रहते है। एक साथ पार कर लेते है। हाथी जब गांव तरफ आता है तो जन धन को बहुत नुकसान पहुंचाता है। घर को तोड़कर धान खा जाते है खेत के धान, भुट्टा अन्य सभी फसल को नुकसान पहुंचाते है। भूख के कारण घर तो तोड़ देते है आदमी को पटक कर मार देते है। जब – जब हाथी आता है सभी दहशत में रहते है। एक बार मोबाइल में वीडियो बनाया था हाथी घर के छप्पर लकड़ी को खींच खींच कर तोड़ रहे थे और तोड़कर धान को खा गए थोड़ी ही दूर से वीडियो बनाया था।।हाथी आने पर रातभर प्रत्येक घर से जागरण करते है।
बाघ , चीता भी कभी कभी आते है 2 वर्ष पहले आए थे तो जंगल में एक किसान गौठान बनाए थे तो 8 या 12 बछड़ा व गाय को काटकर मृत कर दिए थे। लकड़बग्घा तो चलता फिरता रहता है , बकरी को आय दिन खाते रहते है। जंगली सुअर और भालू सभी गांव में फसल व जन हानि करते रहते है। लोगों को उम्मीद है कि एक दिन यहाँ भी विकास की किरणें जरुर आयेंगी.
