
- विसर्जन के दिन पूरा परिवार साथ होता है—माता-पिता, बच्चे, दादा-दादी—और यह सामूहिक अनुभव परिवार को एक सूत्र में बांध देता है।
बिलासपुर , 10 अगस्त , सहकारिता, हरियाली और लोक परंपरा के प्रतीक भोजली माता का विसर्जन रविवार को ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले परमेश्वरा तालाब, मल्हार में श्रद्धा और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। प्राचीन काल से धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का केंद्र रहे इस तालाब के तट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में, सिर पर भोजली लिए, मंगल गीत गाती हुई विसर्जन यात्रा में शामिल हुईं।
भोजली पर्व – एक सांस्कृतिक धरोहर
भोजली पर्व छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है। लोक मान्यता के अनुसार, यह पर्व वर्षा ऋतु में अन्न उत्पादन और हरियाली के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। जों या बाजरा के बीजों को मिट्टी के पात्र या टोकरी में पंद्रह दिन पहले बोया जाता है। प्रतिदिन इन अंकुरित पौधों की सेवा, सिंचाई और पूजन किया जाता है।
भोजली की हरियाली केवल कृषि का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में ताजगी, विकास और उन्नति का संकेत देती है।
भोजली और पंच परिवर्तन – गहरा संबंध
इस वर्ष भोजली विसर्जन को पंच परिवर्तन के पाँच आयामों से जोड़ा गया, जो समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।
1. स्व का बोध (स्वदेशी और संस्कृति से जुड़ाव)
भोजली पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। जों के बीज की बुवाई, उनकी देखभाल और विसर्जन की परंपरा हमारे पूर्वजों से चली आ रही है। यह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि अपने देशज संसाधनों और संस्कृति को अपनाने का संदेश है।
आज जब वैश्वीकरण की तेज़ लहरें हमारी पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित कर रही हैं, ऐसे में भोजली जैसा पर्व हमें याद दिलाता है कि आत्मनिर्भरता और स्वदेशी अपनाना ही स्थायी विकास का आधार है।
2. नागरिक कर्तव्य
अक्सर हम अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं, लेकिन कर्तव्यों को भूल जाते हैं। भोजली पर्व में घर-घर की महिलाएं और बच्चे मिलकर पौधों की सेवा करते हैं, हरियाली और सफाई का ध्यान रखते हैं। यह हमें सिखाता है कि अपने परिवेश को स्वच्छ, सुंदर और हराभरा रखना भी हमारा नागरिक कर्तव्य है।
इसके अलावा, विसर्जन यात्रा में सामूहिक रूप से अनुशासन बनाए रखना, एक-दूसरे की मदद करना, और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करना—ये सब जिम्मेदार नागरिकता के उदाहरण हैं।
3. पर्यावरण संरक्षण
भोजली पर्व का मूल संदेश ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता है। जों के बीजों को बोकर उनकी देखभाल करना, हर दिन उन्हें जल देना और अंत में जलाशय में विसर्जित करना – यह जल, मिट्टी और हरियाली के महत्व को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कराने का तरीका है।
आज के दौर में जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट गंभीर चुनौती बन चुके हैं, भोजली जैसे पर्व हमें प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
4. सामाजिक समरसता
भोजली बीज की बुवाई से लेकर विसर्जन तक का पूरा क्रम सामाजिक एकता और सामूहिकता का प्रतीक है। गांव-गांव, मोहल्लों और नगर के सभी वर्ग—धर्म, जाति, भाषा या आर्थिक स्थिति से परे—इसमें भाग लेते हैं।
विसर्जन यात्रा के दौरान देखा गया कि बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, बच्चे सभी एक साथ, एक ही उद्देश्य और भावना के साथ चल रहे थे। यह सामाजिक समरसता का सजीव उदाहरण है।
5. कुटुम्ब प्रबोधन
भोजली पर्व में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पंद्रह दिनों तक परिवारजन मिलकर पौधों की सेवा करते हैं, प्रतिदिन पूजन और भजन-कीर्तन करते हैं। यह घर-घर में पारिवारिक संवाद, सहयोग और संस्कारों को मजबूत करता है। विसर्जन के दिन पूरा परिवार साथ होता है—माता-पिता, बच्चे, दादा-दादी—और यह सामूहिक अनुभव परिवार को एक सूत्र में बांध देता है।
परमेशरा तालाब – इतिहास और महत्व
जहां इस वर्ष भोजली का विसर्जन हुआ, वह परमेशरा तालाब नगर की ऐतिहासिक धरोहर है। इसे प्रागैतिहासिक काल से जुड़ा माना जाता है और स्थानीय लोककथाओं में इसका उल्लेख मिलता है। तालाब न केवल जलस्रोत है, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का भी प्रमुख केंद्र रहा है। यहां प्रतिवर्ष भोजली और अन्य उत्सवों पर बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। इस बार का भोजली विसर्जन भी इसी परंपरा का हिस्सा था, जिसमें तालाब का शांत और पवित्र वातावरण पूरे आयोजन की गरिमा बढ़ा रहा था।
