उत्तर प्रदेश की आगामी विधानसभा में राजनीतिक दलों ने टिकट वितरण के फॉर्मूले पर काम करना शुरू कर दिया है | कहीं आवेदन मांगे जा रहे हैं , तो कहीं सर्वेक्षण से जिताऊ उम्मीदवार की खोजबीन की जा रही है और कुछ प्रत्याशियों की तो घोषणा भी कर दी गई है जबकि विभिन्न दलों के दावेदार अपने-अपने स्तर से न केवल प्रचार कर रहे हैं, बल्कि टिकट के लिए भी दिल्ली तक दौड़ लगा रहे हैं |
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!टिकट वितरण में राजनीतिक दलों की यह सामान्य घोषणा रहती है कि जिला स्तर से उम्मीदवारों के नाम आते हैं, उनकी स्क्रीनिंग की जाती है | फिर आए पैनल की राज्य कमेटी सत्यापन/ स्क्रीनिंग करती है | उसके बाद टिकट का निर्धारण संसदीय बोर्ड या हाई कमान द्वारा किया जाता है | भारी भरकम कमेटियां बनाई जाती हैं | बड़ी संख्या में दावेदार होते हैं तो जब वास्तविक कार्यकर्ता को टिकट नहीं मिल पाता है, तो उससे नेतृत्व या कोई वरिष्ठ पदाधिकारी द्वारा यही कह दिया जाता है कि उसका नाम जिला यूनिट से आये पैनल में ही नहीं था या फिर प्रदेश कमेटी ने उसे उपयुक्त नहीं समझ कर आगे नहीं बढाया, अन्यथा टिकट मिल जाता | इतना सुनने के बाद दावेदार संतुष्ट हो जाता है |
लेकिन गौर करिए क्या यह बातें सच है ?
आमतौर पर कुछ ही मामलों में वास्तविक उम्मीदवार या पार्टी के मूल कार्यकर्ता को टिकट मिल पाता है, जबकि बड़ी संख्या में टिकटों का वितरण उम्मीदवार की पहुंच पर ही निर्भर करता है | भले ही उम्मीदवार हारने की स्थिति में हो या फिर उसकी जमानत जब्त जैसी स्थिति बन जाए | हाल ही में उत्तर प्रदेश के राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव पर गौर करें तो यही सच लगता है| राज्यसभा में समाजवादी पार्टी ने अचानक एक ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया जो पार्टी का मूल कार्यकर्ता नहीं था और पार्टी के बड़े पदाधिकारियों को भी यह उम्मीद नहीं रही होगी कि किसी इतने बड़े उद्योगपति उम्मीदवार को टिकट मिलेगा और पार्टी का नेतृत्व ही उसकी जीत भी सुनिश्चित कर आएगा क्योंकि आखिर तक समाजवादी पार्टी नेतृत्व तीसरे उम्मीदवार को घोषित करने की वकालत कर रहा था लेकिन ऍनमौके पर पीछे हट गया और दोनों दलों के प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए| न पैनल में नाम और न ही सडक पर संघर्ष करने वाला बायोडाटा ?
विधान परिषद् में टिकट कैसे बंटे
अब हाल ही हुए विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में भी टिकट वितरण को देखिये | यहाँ भी वही फार्मूला देखने मिला है |इन 11 सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान के बाद , 27 अक्टूबर को मतगणना और फिर चुनाव के अंतिम नतीजे घोषित कर दिए गए हैं| इस चुनाव में कांग्रेस तो पहले ही मैदान से बाहर हो गई थी और असली मुकाबला समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच रहा |
वाराणसी और गोरखपुर में किसे टिकट मिला ?
भारतीय जनता पार्टी सतारूढ़ दल होने के कारण उसके दावेदारों की संख्या अधिक रहती है | इस चुनाव में सपा से आगरा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विजयी उम्मीदवार आकाश अग्रवाल ने इसी अक्टूबर माह में ही समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी | इसके पहले 2 साल तक वे भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से जुड़े रहे और बड़ी संख्या में वोट भी उन्हीं के माध्यम से बनाये लेकिन जब भाजपा से टिकट मिलता नहीं दिखा तो फिर समाजवादी पार्टी की ओर से गए और समाजवादी पार्टी ने बिना देरी किए आकाश अग्रवाल को समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार घोषित कर दिया| आकाश अग्रवाल के लिए सपा ने अपने पुराने उम्मीदवार डॉ. प्रकाश चंद्र गुप्ता का टिकट काट दिया | ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि आकाश अग्रवाल को टिकट मिलने का आधार क्या था ?
ठीक ऐसे ही गोरखपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र को देखें तो यहां पर भारतीय जनता पार्टी के संजयन त्रिपाठी खुद को प्रबल दावेदार मान रहे थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने पिछले चुनाव में विजय रहे ध्रुव कुमार त्रिपाठी को संगठन का उम्मीदवार जब घोषित कर दिया तो संजयन त्रिपाठी बागी हो गए और अपने संपर्कों के सहारे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तक पहुंचे | समाजवादी पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार घोषित कर दिया जबकि इसी सीट पर समाजवादी पार्टी ने कमलेश यादव को पूर्व में ही उम्मीदवार घोषित कर रखा था | कमलेश यादव ने काफी प्रचार प्रसार भी किया | समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कमलेश यादव को बुलाकर उन्हें चुनाव न लड़ने के लिए राजी किया और संजयन त्रिपाठी का सपोर्ट करने के लिए कहा| इस चुनाव में समाजवादी पार्टी चुनाव हार गई और तीसरे नंबर पर रही।
इसी तरह से भारतीय जनता पार्टी ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से प्रमोद कुमार मिश्रा को टिकट दिया जबकि सर्व विदित है कि प्रमोद कुमार मिश्रा शर्मा गुट के प्रत्याशी के तौर पर यही से विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं | इस बार भी शर्मा गुट के प्रबल दावेदार थे | शर्मा गुट के ही वे कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष थे लेकिन जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के अपने समीकरणों को दुरुस्त किया और भाजपा ने उन्हें टिकट दे दिया तो वह शर्मा गुट से अलग हो गए|
भारतीय जनता पार्टी वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एक से एक बढ़कर एक कार्यकर्ता और पदाधिकारी थे , जिन्हें टिकट की प्रबल दावेदार थे | लंबे अरसे से पैरवी भी कर रहे थे और चुनाव लड़ने की तैयारी भी लेकिन नेतृत्व ने प्रमोद कुमार मिश्रा को चुनाव से चंद दिन पहले उम्मीदवार घोषित कर दिया | ऐसे में चुनाव की तैयारी कर रहे भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारी को झटका लगा लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो प्रमोद मिश्रा को भी झटका लगा | वे लंबे अंतराल से चुनाव हार गए | उन्हें समाजवादी पार्टी के लाल बिहारी यादव ने हराया | लाल बिहारी यादव पिछला चुनाव भी वाराणसी से समाजवादी पार्टी से ही जीते थे |
हालांकि टिकट वितरण की यह परंपरा कोई नई नहीं है लेकिन सार्वजनिक तौर पर टिकट वितरण को लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उल्लेख करना और फिर इस तरह से टिकट वीरान करना अपने ही मूल्यों का उपहास उड़ने जैसा ही है |
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