

- परम पावन दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में विश्व स्तर पर आयोजित हो रहे समारोहों के बीच तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट ने 11 जुलाई शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट, जब वे हमारे बच्चों को उठाने आएः चीन के औपनिवेशिक आवासीय विद्यालय और तिब्बत का भविष्य 1 के हिंदी संस्करण का लोकार्पण नई दिल्ली में किया।
नई दिल्ली /लखनऊ , 12 जुलाई, campusamachar.com, तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट (Tibet Action Institute ) द्वारा चीनी सरकार द्वारा तिब्बत के आवासीय विद्यालयों में तिब्बती बच्चों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार और जबरन शिक्षा पर किए गए शोध की रिपोर्ट कंस्टीट्यूशन क्लब दिल्ली में जारी की गई। कोर ग्रुप फॉर तिब्बतियन काज के रीजनल कन्वीनर उत्तर प्रदेश & उत्तराखण्ड के रुप में सहभागी रहा। रिपोर्ट का विमोचन तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट द्वारा भारत-तिब्बत समन्वय कार्यालय के सहयोग से नई दिल्ली में आयोजित किया गया। जिसमें मानवाधिकार से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिनिधि, कोरग्रुप फॉर तिब्बतियन काज के पदाधिकारियों के साथ ही देश विदेश के पत्रकार और प्रतिनिधि शामिल थे।
परम पावन दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में विश्व स्तर पर आयोजित हो रहे समारोहों के बीच तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट ने आज 11 जुलाई शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट, जब वे हमारे बच्चों को उठाने आएः चीन के औपनिवेशिक आवासीय विद्यालय और तिब्बत का भविष्य 1 के हिंदी संस्करण का लोकार्पण नई दिल्ली में किया। मूल रूप से अंग्रेजी में 28 मई, 2025 को ऑनलाइन जारी की गई यह रिपोर्ट इस बारे में नए साक्ष्य प्रस्तुत करती है। इसमें उजागर किया गया है कि केसे तिब्बती बच्चे चीनी सरकार द्वारा तिब्बत में औपनिवेशिक आवासीय विद्यालयों और प्रीस्कूलों के विशाल नेटवर्क में दुर्व्यवहार, उपेक्षा, शिक्षा और पहवान खत्म होने के संकट का सामना करते हैं।

इस लोकार्पण समारोह में प्रमुख भारतीय और तिब्बती नेताओं ने भाग लिया, जिनमें राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के पूर्व विशेष सलाहकार अमिताभ माथुर, कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक आर. के. खिरमे, तिब्बत में चीन की आत्मसात और शिक्षा नीतियों के प्रमुख विशेषज्ञ डॉ. ग्याल लो और तिब्बती सांसद और तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट में एशिया कार्यक्रम प्रबंधक दोरजी सेतेन शामिल थे। पत्रकारों, शोधकर्ताओं, अधिवक्ताओं, तिब्बत समर्थक समूहों के शीर्ष समन्वय निकाय कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज इंडिया के सदस्यों और तिब्बती समुदाय के सदस्यों ने भी भाग लिया, जिससे कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता पर बल मिला।
एक ओर जहां चीनी सरकार पुनर्जन्म प्रक्रिया में हस्तक्षेप करके दलाई लामा संस्था को अपने कब्जे में करने की कोशिश कर रही है. वहीं दूसरी ओर वह आत्मसात करने वाली नीतियों के माध्यम से तिब्बती बच्चों को भी निशाना बना रही है। इस तरह वह अपनी नीतियों के माध्यम से एक अलग राष्ट्र के रूप में तिब्बत के अस्तित्व को खतरे में डालती हैं। तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट द्वारा तिब्बत में चीनी सरकार की आवासीय व्यवस्था का पहली बार खुलासा करने के लगभग चार साल बाद 2, अब माना जाता है कि लगभग दस लाख तिब्बती बच्चे 3 इन आवासीय विद्यालयों में जबरन रखे गए हैं। रिपोर्ट स्कूलों और अन्य शिक्षा नीतियों के विनाशकारी प्रभाव के नए प्रमाण भी प्रस्तुत करती है। दुर्लभ, प्रत्यक्ष वृत्तांतों से पता चलता है कि छात्र शारीरिक और मानसिक शोषण का शिकार होते हैं और कुछ मामलों में तो उनकी मृत्यु भी हो जाती है। माता-पिता बताते हैं कि स्कूल में रहते हुए वे अपने बच्चों से आसानी से संपर्क नहीं कर पाते। बच्चों को कम उम्र में ही कुछ ग्रामीण इलाकों में तो चार साल की उम्र में ही उनके परिवारों से अलग कर दिया जाता है और उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार रहने के लिए मजबूर किया जाता है।

तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट में तिब्बत मामलों और शिक्षा मामलों के विशेषज्ञ डॉ. ग्याल लो ने ज़ोर देकर कहाः
‘चीन द्वारा परम पावन दलाई लामा के भावी पुनर्जन्म के चयन की प्रक्रिया पर नियंत्रण स्थापित करने के प्रयास को उसकी औपनिवेशिक आवासीय विद्यालय प्रणाली के माध्यम से तिब्बती बच्चों की पूरी पीढ़ी को नया रूप देने के उसके बेहद परेशान करने वाले प्रयास के समानांतर देखा जाना चाहिए। ये कोई अलग-थलग नीतियां नहीं हैं, बल्कि ये तिब्बती पहचान, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं को मिटाने की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा हैं। चीन के औपनिवेशिक आवासीय विद्यालय तिब्बती बच्चों को शिक्षित करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें धर्म प्रचारित करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इस रिपोर्ट में दिए गए साक्ष्य मेरे शोध और मेरे अपने परिवार के अनुभव की पुष्टि करते हैं: चीनी अधिकारी जान-बूझकर हमारे बच्चों को हमसे दूर कर रहे हैं और उन्हें अपनी परंपराओं से अलग कर रहे हैं।”
हाल के वर्षों में चीनी सरकार ने तिब्बतियों द्वारा संचालित स्कूलों और स्थानीय गांवों के स्कूलों को बंद किया है, जिससे तिब्बती अभिभावकों के पास अपने बच्चों को सरकारी आवासीय विद्यालयों में भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। वहां, जिन बच्चों की मातृभाषा तिब्बती है, वे लगभग पूरी तरह से चीनी भाषा में ही स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हैं। तिब्बती भाषा की सामग्री, चित्र या सांस्कृतिक सामग्री को पाठ्यक्रम और कक्षा की दीवारों तक से हटा दिया जाता है, ताकि बच्चों को चीनी पहचान और संस्कृति से परिचित कराया जा सके।
श्री सुजीत कुमार, संसद सदस्य (राज्यसभा) ने कहा:
“इस रिपोर्ट में किए गए खुलासे बेहद परेशान करने वाले हैं और काहितकिए जाने की आते हैं। करुणा और व्याप पर आधारित एक लोक के रूप में भारतकथा, संस्कृति और पहचान को बधाए रखने के संघर्ष में एकजुटता में खड़ा है। दुनिया में कभी किसी को करने पर उसके परिवार शिकार के अलग नहीं किया जाना चाहिए। मैं इसके बारे में केएनयूट की गहना करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बओं के अधिकारों के इन गंभीर उत्तपनों के खिलाफ निर्णयक कार्रवाई करने का आग्रह करता हूँ।
इन्ही विताओं को दोहराते हुए कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज के राष्ट्रीय संयोजक आर. के. खिरमे ने कहा
“भारतीय होने के नाते तिब्बत के साथ हमारा एक गहरा सभ्यतागत बंधन है। यह बंधन बौद्ध धर्म, भाषा और दर्शन की पि में निहित है. जो सदियों से दोनों देशों के लोगों के बीच प्रवाहित होती रही है। तिब्बती भाषा, मडवासी विरासत और सांस्कृतिक हति रिवाज न केवल तिब्बत की अभित्र पहचान है, बल्कि ये भारत की अपनी आध्यात्मिक और कृतिका विस्तार है। निर्वासित तिब्बती समुदाय के दीर्घकालिक मेजबान और साझा सभ्यतागत मूल्यों के संरक्षण में स्वाभाविक सहयोगी के रूप में भारत की नैतिक और ऐतिहासिक दोनों जिम्मेदारी है कि वह आवाज उठाए। तिब्बती बच्चों के अधिकारों की रक्षा और हमारी अपनी विरासत में धनिष्ठ रूप से जुड़ी विरासत की रक्षा के लिए इस विनाशकारी नीति को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय में तिब्बती मामलों के पूर्व विशेष सलाहकार अमिताभ माथुर ने कहा
“भारत को तिब्बत जैसी एक अनूठी संस्कृति को मिटाने के प्रयास के प्रति मूक-बधिर बनकर नहीं रहना चाहिए। तितका आध्यात्मिक उद्म हमारी नालंदा परंपरा से जुड़ा है और जिसकी लिपि देवनागरी से ही निकली है।’
निर्वासित तिब्बती संसद के सदस्य और तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट के एशिया कार्यक्रम प्रबंधक दोरजी सेतेन ने ताकात कार्रवाई का आह्वान करते हुए कहा:
‘तिब्बती बच्चों की एक पूरी पीढ़ी को उनके परिवारों से अलग किया जा रहा है। इससे न केवल इन बच्चों और उनके परिवारों को बल्कि समग्र रूप से तिब्बती समाज को होने वाली सामाजिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक क्षति दशकों तक महसूस की जाएगी। टुनिया की सरकारों और संयुक्त राष्ट्र को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए और इस हानिकारक और दमनकारी व्यवस्था को तत्काल समाप्त करने की मांग चीन सरकार से करनी बाहिए।
तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट संयुक्त राष्ट्र, भारत सरकार और अन्य संबंधित सरकारों से आग्रह करता है कि वे चीनी सरकार से चीनी सरकारी आवासीय विद्यालयों में तिब्बती बच्चों के कधित दुर्व्यवहार, मौतों और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं की तुरंत सार्वजनिक जांच कराने, आवासीय विद्यालयों और औपचारिक रूप से शिक्षा शुरू करने से पहले के प्रीस्कूलों की दमनकारी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए और तिब्बती बच्चों को घर पर ही मातृभाषा में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने का आह्वान करें।
