- पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के भूगोल विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और छत्तीसगढ़ के प्रख्यात पर्यावरणविद् प्रोफेसर पीएल चंद्राकर का कहना है कि प्रगति के नाम पर नदियों की उपेक्षा की जा रही है,
रायपुर , 13 जून, प्राचीन धार्मिक ग्रंथो में नदी और गाय को पूज्यनीय माना गया है. गाय और नदी को भगवदगीता, पुराण में इतना अधिक महत्व दिया गया है कि मंदिरों में नदियों और गौ माता के चित्र रेखांकित किए जाते हैं, छत्तीसगढ़ के कई बड़े शहरों में बने मंदिरों में नदियों के चित्र बने हैं , मुख्य द्वार पर नदियों और गौ माता के चित्र बनाकर उन्हें पूजने की परंपरा रही है ,
छत्तीसगढ़ में महानदी , शिवनाथ नदी, खारुन नदी, अरपा नदी , हसदेव नदी, केलो नदी , हाँप नदी , ताल नदी , सोंढुर नदी , दूध नदी , खरखरा नदी , लीलागर नदी , मनियारी नदी , तांदुला नदी , जोंक नदी , शबरी नदी मांड नदी, पैरी नदी और इन्द्रावती सहित कई नदियां ऐसी हैं जिनके किनारे ही जीवन चलता रहा है और इन नदियों के किनारे बहुत बड़ी मानव सभ्यता का विकास हुआ है. प्रमुख तीर्थ स्थल यह गवाही देते हैं कि यह स्थान सिर्फ और सिर्फ नदियों के तट पर बसे होने के कारण ही पूजनीय है . रायपुर में महादेव घाट कुछ ऐसा ही प्रतीक बना हुआ है कि नदियां किस तरह से पूजनीय है, लेकिन आज दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनती दिखाई दे रही है ,

नदियों के संरक्षण , जल प्रबंधन और उनके रखरखाव की अनदेखी के कारण सूखने होने जैसी स्थिति पैदा हो गई है, ऐसे में न केवल जनजीवन प्रभावित होने वाला है, बल्कि देश की सांस्कृतिक, धरोहर , विरासत, परंपराएं भी प्रभावित हो रही है. इसलिए जरूरी है कि नदियों के संरक्षण के लिए न केवल सामाजिक सहभागिता बड़े बल्कि राज्य सरकार की भी यह जिम्मेदारी है कि नदियों से लिया जा रहा जल के बदले उनके विकास , संरक्षण के लिए भी पर्याप्त कदम उठाए जाने चाहिए ,
छत्तीसगढ़ की कई नदियों से उद्योगों को बराबर पानी दिया जा रहा है लेकिन उसे पानी के बदले नदी को क्या मिल रहा है ? यह सोचनीय है विषय है और आम जनता से जुड़ा हुआ है, इसलिए महत्वपूर्ण है कि किसी भी सूरत में नदियों के प्रवाह को बाधित न किया जाए उन्हें सुगमता से बहने दिया जाए ताकि वे सदानीरा बनी रहे ,

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के भूगोल विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और छत्तीसगढ़ के प्रख्यात पर्यावरणविद् प्रोफेसर पीएल चंद्राकर का कहना है कि प्रगति के नाम पर नदियों की उपेक्षा की जा रही है और नदियों से पहले जल जिन पात्रों में लिया जाता था वे लोगों की प्यास बुझाते थे और जरूरत भर का ही पानी लिया जाता था लेकिन आज कहीं अधिक पानी लिया जा रहा है और वह पानी नदियों को खोखला और सूखा बनता जा रहा है , उन्होंने कहा कि ट्यूब वेल जैसे विकल्प तो लोगों ने निकाले हैं लेकिन यह समझना होगा कि नदी केवल मात्र जल देने वाली ही नहीं है बल्कि यह जीवन की धारा है और न केवल सरकार बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि नदियों की अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आगे ठोस कदम उठाये जायं .

पलारी बलोदा बाजार भाटापारा जिला का ईट से बना आठवीं सदी पुराना सिद्धेश्वर महादेव मंदिर इसके द्वारा में मां गंगा और यमुना का त्रिभंग मुद्रा में मूर्ति नदियों का मूर्ति रूप में मंदिरों के तोरण द्वार में फिंगेश्वर और पलारी में चित्रण किया गया है. यह दोनों महानदी शिवनाथ और पैरी के आसपास बसे हुए क्षेत्र हैं. नदी देवी का तोरण द्वार में मूर्ति सुरंग मंदिर सिरपुर में भी खुदाई से मिला है
खुदाई से मिला सुरंग मंदिर सिरपुर
पलारी बलोदा बाजार भाटापारा जिला का ईट से बना आठवीं सदी पुराना सिद्धेश्वर महादेव मंदिर इसके द्वारा में मां गंगा और यमुना का त्रिभंग मुद्रा में मूर्ति नदियों का मूर्ति रूप में मंदिरों के तोरण द्वार में फिंगेश्वर और पलारी में चित्रण किया गया है . यह दोनों महानदी शिवनाथ और पैरी के आसपास बसे हुए क्षेत्र हैं, फिंगेश्वर के फणीश्वर नाथ मंदिर में तोरण द्वार पर पैरी नदी महानदी को मूर्ति रूप में चित्रित किया गया है।
इसी प्रकार सिरपुर के सुरंग मंदिर जो खुदाई से प्राप्त हो लगभग साथ छठवीं सातवीं सदी पुराना के दौरान द्वारा में नदी मां को मूर्ति रूप में चित्रित करके चित्र रूप में छत्तीसगढ़ में नदी के महत्वपूर्ण रेखा अंकित करने का प्रयास प्रारंभ में किया गया क्योंकि प्राचीन स्थल नदी के तट पर ही विकसित हुई नदी के महत्व को बहुत अच्छे से जानते थे किंतु छत्तीसगढ़ में आज सारी नदियां ग्रीष्म काल में सूख जाती है .
