- काव्य गोष्ठी में डॉ.मार्तण्ड ‘संकेत साहित्य रत्न’ से सम्मानित हुए
रायपुर . संकेत साहित्य समिति द्वारा वृंदावन हॉल रायपुर में 23 सितंबर को 46वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में कोलकाता से पधारे भाषाविद् , साहित्यकार एवं साहित्य त्रिवेणी के संपादक डॉ.कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड के मुख्य आतिथ्य , छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा की अध्यक्षता एवं भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.चितरंजन ,लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.रेशमा अंसारी के सारस्वत अतिथ्य में राजभाषा हिंदी पर केन्द्रित परिचर्चा एवं सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के पश्चात समिति द्वारा अतिथियों का अंगवस्त्र एवं श्रीफल से सम्मान किया गया। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा डॉ.कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड को संकेत साहित्य रत्न सम्मान से सम्मानित भी किया गया। संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में राजभाषा हिंदी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी केवल भाषा नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की संवाहिका भी है जो देश विदेश में रहे करोड़ों लोगों को आपस में जोड़ती है।व्याकरण, लिपि एवं उच्चारण की दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शशांक शर्मा ने कहा कि संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के सामने कोई संकट नहीं है। देश में हिंदी को अंग्रेजी चुनौती दे रही है क्योंकि उसे ज्ञान की भाषा मान लिया गया है।सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से हिंदी की लोकप्रियता में गुणोत्तर इज़ाफ़ा हुआ है।साहित्य में हिंदी के सरलीकरण को भी उन्होंने समय की माँग निरुपित किया।
मुख्य अतिथि डॉ.कुँवर वीर सिंह ‘मार्तंड’ ने हिंदी के इतिहास एवं महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं है अपितु वह हमारी स्मृतियों, सांस्कृतिक चेतना, संवेदना, संस्कृति एवं सामूहिक विचारधारा की भाषा भी है। उन्होंने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि राजभाषा हिंदी को केंद्र में रखकर आयोजित यह सार्थक कार्यक्रम साहित्यिक चेतना, हिंदी-प्रेम और रचनात्मक संवाद का सुंदर उदाहरण है। डॉ.चितरंजन कर ने कहा कि कोई भी भाषा संस्कृति होती है,चेतना होती है। हिंदी में मैंने जीवन जगत को पाया है ,ब्रम्ह दृष्टि है हिंदी। गिरीश पंकज ने कहा कि आज हिंदी का परचम पूरी दुनिया में लहरा रहा है ,कई देशों की संवैधानिक भाषा बन गई है। मुझे हिंदी का भविष्य उज्जवल नज़र आता है।
पल्लवी झा के सफल संचालन में प्रांत के विभिन्न जिलों से आए जिन कवियों एवं कवयित्रियों ने रोचक काव्य पाठ किया उनमें डॉ.कुँवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड’,डॉ.चितरंजन कर ,गिरीश पंकज, डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’,डॉ.रेशमा अंसारी,मीर अली ‘मीर’,राजेश जैन ‘राही’ उदयभान सिंह चौहान, सुरेन्द्र रावल, डॉ. दीनदयाल साहू, मधु मार्तंड, संजीव ठाकुर, डॉ.रविन्द्र सरकार , पल्लवी झा, सुषमा पटेल, हरीश कोटक. राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, गणेशदत्त झा, यशवंत यदु, ,राजेन्द्र रायपुरी , विवेक राहटगाँवकर, एच.एल. चन्द्राकर , दिलीप वरवंडकर, डॉ.सिद्धार्थ श्रीवास्तव , राजेन्द्र ओझा, कुमार जगदली, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा , माधुरी कर, सीमा पांडे, डॉ.कोमल प्रसाद राठौर, मुरलीधर गोंडाने ‘नीर’,ऋषि साव,मन्नू लाल यदु ‘नाथ’, डॉ.एन.पी.यादव, वीरेन्द्रशर्मा’अनुज’,डॉ(श्रीमती) कमल वर्मा, बीबीपी मोदी, भूपेंद्र शर्मा’भूप’,डॉ.गोपा शर्मा, कल्याणी तिवारी, विजया ठाकुर, गोपाल सोलंकी, मंजूषा अग्रवाल, प्रीतिरानी तिवारी, शशांक खरे, शोमकांत.शर्मा एवं अमरदीप शर्मा के नाम प्रमुख हैं।
संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में राजभाषा हिंदी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी केवल भाषा नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की संवाहिका भी है जो देश विदेश में रहे करोड़ों लोगों को आपस में जोड़ती है।व्याकरण, लिपि एवं उच्चारण की दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शशांक शर्मा ने कहा कि संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के सामने कोई संकट नहीं है। देश में हिंदी को अंग्रेजी चुनौती दे रही है क्योंकि उसे ज्ञान की भाषा मान लिया गया है।सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से हिंदी की लोकप्रियता में गुणोत्तर इज़ाफ़ा हुआ है।साहित्य में हिंदी के सरलीकरण को भी उन्होंने समय की माँग निरुपित किया।

डॉ. रेशमा अंसारी ने वर्तमान परिवेश में हिंदी की भूमिका को चित्रित करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता की हिंदी के विकास में योगदान को सराहा एवं देवनागरी लिपि को संरक्षित करने पर भी ज़ोर दिया।

