लखनऊ, 18 अप्रेल । लखनऊ विश्वविद्यालय (Lucknow University ) से संबद्ध स्नातक (यूजी) कॉलेजों के शिक्षकों को अब पीएचडी शोधार्थियों का मार्गदर्शन करने के अयोग्य मानने के निर्णय ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। विश्वविद्यालय की विद्या परिषद द्वारा हाल ही में पारित संशोधित पीएचडी अध्यादेश 2026 के तहत यह व्यवस्था लागू की गई है। इस निर्णय का असर राजधानी के कई कॉलेजों पर पड़ने की संभावना है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ( Lucknow University) के अनुसार, अब केवल वे ही संस्थान पीएचडी कार्यक्रम चला सकेंगे जो निर्धारित मानकों को पूरा करेंगे। इनमें संबंधित विषय में स्नातक एवं परास्नातक पाठ्यक्रम, कम से कम दो स्थायी शिक्षक, पर्याप्त पुस्तकालय संसाधन और शोध सुविधाएं शामिल हैं। इन व्यवस्थाओं का सत्यापन विश्वविद्यालय द्वारा गठित समिति करेगी, जिसकी अध्यक्षता कुलपति या उनके प्रतिनिधि करेंगे।
इसी बीच, एलयू ( Lucknow University) ने शैक्षणिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कंसल्टेंसी पॉलिसी 2026 भी लागू की है, जिसके तहत शिक्षकों को परामर्श कार्यों में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। कुलपति प्रो. जेपी सेनी ने इसे अकादमिक और औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
हालांकि, यूजी कॉलेजों के शिक्षकों में इस फैसले को लेकर गहरा असंतोष देखा जा रहा है। शिक्षकों का आरोप है कि विश्वविद्यालय उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार कर रहा है और कैरियर उन्नति के अवसरों में उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। लुआक्टा अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय ने चेतावनी दी है कि यदि निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो शिक्षक आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
शिक्षकों ( Lucknow University) का कहना है कि यह निर्णय न केवल उनके शैक्षणिक अधिकारों का हनन है, बल्कि इससे पीएचडी सुपरवाइजरों की संख्या में कमी आएगी। पहले से सीमित गाइड की उपलब्धता और घटने से शोध में प्रवेश लेने वाले छात्रों के लिए अवसर कम हो जाएंगे। इससे अनेक प्रतिभाशाली छात्र पीएचडी करने से वंचित हो सकते हैं या उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय से उच्च शिक्षा में असमानता बढ़ने की आशंका है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के छात्रों पर इसका अधिक प्रभाव पड़ेगा। साथ ही, विश्वविद्यालय और कॉलेजों के बीच शैक्षणिक सहयोग भी प्रभावित हो सकता है।
शिक्षकों और शिक्षा विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि यदि गुणवत्ता को लेकर कोई चिंता है तो उसके लिए सख्त मानक और पारदर्शी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए, न कि पूर्ण प्रतिबंध। उनका मानना है कि योग्य और अनुभवी शिक्षकों को, चाहे वे यूजी कॉलेज में हों या विश्वविद्यालय में, पीएचडी सुपरविजन का अवसर मिलना चाहिए। फिलहाल, इस निर्णय को लेकर विश्वविद्यालय और शिक्षकों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है और आने वाले समय में इस पर और विवाद बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
