
लखनऊ. नए जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS lucknow) डॉ.अमरकांत सिंह संभवत: सोमवार को कार्यभार ग्रहण करेंंगे। अब तक बरेली में इसी पद पर कार्यरत रहे डॉ. सिंह के सामने कुर्सी संभालते ही कई चुनौतियां सामने होंगी और इनमें सबसे बड़ी चुनौती क्रिश्चियन व सेंटीनियलं इंटर कालेज प्रबंधन समिति की वैधता को लेकर उठ रहे सवाल हैं। इसके अलावा विभागीय फाइलों में भी कई ऐसे जिन्न हैं।
राजधानी के जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS lucknow) की कुर्सी संभालने के लिए शासन ने बरेली के जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ.अमरकांत सिंह का ट्रांसफर किया है। वे अब तक बरेली के डीआईओएस थे। लखनऊ के हाल ही में DIOS पद से हटाए गए डॉ.मुकेश कुमार सिंह को बरेली इसी पद पर भेजा गया है। आइए इन पाइंट्स में समझें नए जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ.अमर कांत सिंह के समक्ष क्या हैं चुनौतियां-
अब तक ये हुआ
DIOS lucknow डॉ मुकेश कुमार सिंह के ट्रांसफर की कोई एक वजह खुलकर सामने नहीं आई है लेकिन चर्चाओं को अगर मानें तो अन्य प्रकरणों के साथ ही क्रिश्चियन व सेंटीनियल इंटर कालेज के प्रबंधन विवाद को सही ढंग से हल न किया जाना माना जा रहा है। इसके पीछे एक केंद्रीय राज्य मंत्री की सक्रियता मानी जा रही है। हालांकि शिक्षक नेता इसे सही नहीं मानते हैं लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि उन्होने प्रबंधन विवाद को हल नहीं किया।
अब ये हैं चुनौतियां
पहली चुनौती यह है कि डॉ.अमरकांत सिंह जब DIOS lucknow की कुर्सी पर बैठेंगे तो उनके सामने कई विवादित मामलों से जुड़ी फाइलें होंगी। इनमें क्रिश्चियन व सेंटीनियल इंटर कालेज के विवाद से जुड़ी होगी। यह मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में है और उन्हीं के निर्देश पर मंडलायुक्त ने जांच के लिए एक कमेटी बनाई है। लेकिन अंतत: फाइल निर्णय को क्रियान्वित करने के लिए डीआईओएस की ही टेबल पर आएगी। इसमें एक पक्ष माध्यमिक शिक्षक संघ जैसा प्रभावी शिक्षक संगठन है, जिसका नेतृत्व संगठन के प्रदेशीय मंत्री व प्रवक्ता डॉ.आरपी मिश्र कर रहे हैं। डॉ.मिश्र की शिक्षकों पर पकड़ और मुद्दों की समझ अन्य के मुकाबले बेहतर है और वे कई बार इसे साबित भी कर चुके हैं। समस्या के समाधान तक आंदोलन करते हैं।
दूसरी सबसे बड़ी चुनौती समय से शिक्षकों के वेतन भुगतान की है। यह शिक्षकों की सबसे बड़ी पीड़ा है। कई-कई माह तक उन्हें नियमित वेतन भुगतान नहीं हो पाता है। दशहरा के अवसर पर भी वेतन के लिए उन्हें धरना-प्रदर्शन के लिए मजबूर होना पड़ा।
तीसरी सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा माफियाओं से निपटने की है। बोर्ड परीक्षा के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैँ। हालांकि अभी तो फार्म ही भरे जा रहे हैं लेकिन अंदरखाने में सेंटर बनाने की भी तैयारी चल रही है। ऐसे में राजधानी में माध्यमिक विद्यालयों की संख्या को देखते हुए यह एक ऐसा काम है,जिसके लिए हर स्तर से सिफारिशें आती हैं। कई तो नकल के ठेकेदार ऐसे-ऐसे फोन कराते हैं कि अधिकारी मुंह तक बंद रखते हैं।
चौथी चुनौती सहायता प्राप्त विद्यालयों में कई के प्रबंधतंत्र परिसरों का व्यावसायिक उपयोग कर रहे हैँ। कई ने तो स्कूल का अस्तित्व तक ही मिटाने का काम कर डाला लेकिन अभी थोड़ा-बहुत बचा हुआ है और शिक्षक लड़ाई लड़ रहे हैं, ऐसे में नए जिला विद्यालय निरीक्षक के सामने यह एक बड़ी चुनौती है।
पांचवी चुनौती यह है कि डॉ.ङ्क्षसह के लखनऊ के ही BSA रह चुके हैं वे उनके काम करने का अपना स्टाइल है लेकिन माध्यमिक में कभी-कभी यह स्टाइल उल्टा पड़ जाता है। इसलिए बीएसए व डीआईओएस की कुर्सी के अंतर को समझते हुए सामंजस्य बिठाना होगा। बीएसएस कार्यालय आने वाले स्कूल प्रबंधक माध्यमिक विद्यालयों के प्रबंधकों की तरह ताकतवर नहीं होते हैं।
छठवीं चुनौती शिक्षकों व कर्मचारी संगठना के पदाधिकारियों से तालमेल बनाते हुए कामकाज करना है। इनमें किसी एक को भी नाराज करके राजधानी में शांतिपूर्वक काम नहीं किया जा सकता है। इनके नेताओं की भी अपनी पहुंच है और वे नाराज होने पर कुर्सी के लिए खतरा बन सकते हैँ। अतीत में कई ऐसे उदाहरण सबके सामने हैं।
बहरहाल इतनी चुनौती भी नहीं है कि इनसे निपटा न जा सके लेकिन अगर सही तरीके से चुनौतियों का सामना किया तो निश्चित तौर पर प्रशासनिक स्तर पर बेहतर रिजल्ट दे पाएंगे। शिक्षक संगठनों को भी डॉ.सिंह के कुर्सी पर बैठने का इंतजार है।
