

- कोरबा जैन समाज को साधुओं का सत्संग चाहिए तो निरंतर प्रयास करो, भावना बलवती रखो और मन के भाव मन में ही रखो,ऐसा नहीं आचार्य श्री के समक्ष मुनि महाराजों से व्यक्त भी करते रहो।
कोरबा, 15 अप्रैल, campussamachar.com, अर्थ के अर्थ का ज्ञान नहीं होना अनर्थ है, जो जान लेता है वो परमार्थ का अर्थ समझ जाता है। निर्यापक श्रमण श्री समता सागर महाराज ने ऊर्जा नगरी कोरबा के जिनमंदिर प्रांगण में जैन समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि कोरबा में अर्थ का प्रवाह तो बहुत है मगर आपको अर्थ का अर्थ समझने की आवश्यकता है।
संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य निर्यापक मुनि श्री समता सागर महाराज ने कहा कि कोरबा आने की संभावना नहीं थी मगर आपकी भावना और बार बार के आग्रह से कोरबा आने का भाव बन गया। भावना बलवान हो तो संभावना में संशोधन हो जाता है। आपके पास अर्थ का प्रवाह है आवश्यकता अर्थ के अर्थ को समझने की है और उचित पुरुषार्थ से अर्थ को परमार्थ में ढालने की है। मुनि श्री ने भक्ति के प्रवाह को समझाते हुए कहा कि कोरबा में पत्रकार वेदचन्द जी को 31 वर्षों के उपरांत पड़गाहन का अवसर मिला। इतने वर्षों से स्थान स्थान पर आते रहे दर्शन करते रहे भक्ति करते रहे,और जैसे पड़गाहन के लिये परिवार के साथ विधि पूर्वक खड़े हुये अवसर मिल गया, क्योंकि इतने वर्षों से इनकी भक्ति ज्यों की त्यों बनी रही। भावना से संभावना बन जाती है।
कोरबा जैन समाज को साधुओं का सत्संग चाहिए तो निरंतर प्रयास करो, भावना बलवती रखो और मन के भाव मन में ही रखो,ऐसा नहीं आचार्य श्री के समक्ष मुनि महाराजों से व्यक्त भी करते रहो। कोरबा में जैन मंदिर का विशाल परिसर है,ऐसा परिसर छत्तीसगढ़ में संभवतः अन्यत्र नहीं है। शुद्ध जल के श्रोतों का अभाव हो रहा है। मंदिरों में शुद्ध जलसंग्रह के लिये अमृत कुण्ड का प्रबंध करना चाहिए। अमृत कुण्ड में बरसात में सतह में प्रवाहमान जल को इस प्रकार संग्रहित किया जाता है कि जल तक सूर्य की रश्मियां न पहुंचे। इस प्रकार यह जल सुदीर्घ अवधि तक उपयोग योग्य बना रहता है।ऐसा प्रबंध अनेक जैन जिनालयों के परिसर में किया गया है।ये प्रबंध सुरक्षित और उपयोगी है।
इसके पूर्व वेदचन्द जैन ने कहा कि निर्यापक श्रमण श्री समता सागर महाराज का कोरबा की ऊर्जा वान भूमि पर प्रथम आगमन कोरबा जैन समाज के लिये सौभाग्य शाली अवसर है। इस अल्प प्रवास काल में ही समाज में मुनि महाराजों के सत्संग पाने की भावना में तीर्वता आयेगी। आपने इन पंक्तियों के साथ कि
“प्रभु दर्शन फिर गुरु कृपा तद्नुसार पुरुषार्थ
दुर्लभ जग में तीन ये,मिले सार परमार्थ”
महाराज जी से उद्बोधन का आग्रह किया। कोरबा जैन समाज के अध्यक्ष डॉ प्रदीप जैन ने मुनसंघ से पावस योग चातुर्मास का निवेदन करते हुवे कोरबा की भूमि पर पधारने के लिए आभार व्यक्त किया।
