आयातित संवेदनाओं से सृजित रचनाएँ अमौलिक एवं प्रभावहीन होती हैं : डॉ अवधेश मिश्र
कलाएँ कलाकार के परिवेश से आत्मसात संस्कारों और मूल्यों की अभिव्यक्ति : डॉ अवधेश मिश्र
कानपूर , 01 मार्च : छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर ( Chhatrapati Shahu Ji Maharaj University, Kanpur ) के स्कूल ऑफ क्रिएटिव एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स में 27 एवं 28 फरवरी को “भारतीय कला में विविधता, निरंतरता और वैश्विक संवाद” विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश-विदेश के कला विशेषज्ञों, शिक्षाविदों एवं कलाकारों ने भारतीय कला की परंपरा, समकालीन चुनौतियों तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर सार्थक विमर्श किया।
Chhatrapati Shahu Ji Maharaj University, Kanpu : कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुंबई के वरिष्ठ कलाकार सुहास बहुलकर और मुख्य वक्ता प्रख्यात कलाकार अवधेश मिश्र थे। कार्यक्रम के संरक्षक एवं प्रति कुलपति प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय कला केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना, जीवन-दर्शन और सामाजिक अनुभवों का सजीव प्रतिबिंब है। आज भारतीय कलाकार लोक एवं पारंपरिक कलाओं को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए नई सृजनात्मक दिशाएँ स्थापित कर रहे हैं।
मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध कलाकार सुहास बहुलकर ने भारतीय कला की प्राचीनता एवं उसकी अखंड परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कला साधना निरंतर अनुभव और आत्मानुशीलन की प्रक्रिया है। उन्होंने चित्रकूट में निर्मित “राम दर्शन” को केवल एक मंदिर न मानते हुए कला की जीवंत पाठशाला बताया, जिससे प्रत्येक कलाकार को प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। बीएचयू से पधारे बीज वक्ता प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा ने भारतीय कला के ऐतिहासिक विकास क्रम को रेखांकित करते हुए प्रागैतिहासिक शैलचित्रों, अजंता की भित्ति चित्र परंपरा तथा चोलकालीन शिव तांडव मूर्तियों के उदाहरणों द्वारा भारतीय कला की निरंतरता को वैश्विक पहचान का आधार बताया।
वहीं वक्ता प्रो. मनीष अरोड़ा ने पारंपरिक कला विधाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी माध्यम कला को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होंगे। चित्रकूट से आए डॉ. जयशंकर मिश्रा ने लोककलाओं को जनजीवन के उत्सव और सामूहिक संवेदना का प्रतीक बताया।
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका के संपादक डॉ. अवधेश मिश्र ने संगोष्ठी के मूल विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कला स्वभावतः विविधतापूर्ण होती है, क्योंकि वह कलाकार के ज्ञान, अनुभव और कौशल से निर्मित होती है। यही विविधता कला को जीवंत बनाए रखती है तथा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के विकास क्रम के साथ उसकी निरंतरता सुनिश्चित करती है। डॉ. मिश्र ने कला की अवधारणा स्पष्ट करते हुए कहा कि जब किसी कार्य में सृजनात्मकता का समावेश हो जाता है, वही कला का रूप ग्रहण कर लेता है।

कलाएँ कलाकार की पृष्ठभूमि, परिवेश और जीवनानुभवों से आत्मसात संस्कारों एवं मूल्यों की अभिव्यक्ति होती हैं। संवेदनाएँ जब मानसपटल पर संचित होकर अनुकूल वातावरण प्राप्त करती हैं, तब मौलिक रचना का जन्म होता है, जिसमें स्थानीयता अनिवार्य तत्व है। उन्होंने कहा कि आयातित संवेदनाओं पर आधारित रचनाएँ प्रायः प्रभावहीन हो जाती हैं तथा कलाकार अपनी सांस्कृतिक पहचान से दूर होने लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म अथवा सत्ता के प्रभाव में कला अपने मूल उद्देश्यों से विचलित होकर केवल संदर्भों के चित्रण तक सीमित हो सकती है, जबकि शास्त्रीय कलाओं की वास्तविक उत्पत्ति लोकजीवन से हुई है और इसी कारण वे जनकल्याणकारी स्वरूप धारण करती हैं।
Chhatrapati Shahu Ji Maharaj University, Kanpur news : वैश्विक कला संवाद पर चर्चा करते हुए डॉ. मिश्र ने हाल में आयोजित इंडिया आर्ट फेयर का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन वैश्विक संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं, किंतु उनमें भारतीय संवेदनात्मक आधार को सुदृढ़ बनाए रखने की आवश्यकता है। उन्होंने मीडिया एवं कला समीक्षकों की भूमिका पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता व्यक्त करते हुए मौलिक रचनाकारों को प्रोत्साहन देने पर बल दिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर विचार रखते हुए मुख्य वक्ता ने कहा कि जिस प्रकार कैमरा और छापाकला को प्रारंभ में स्वीकारा नहीं गया था, किंतु बाद में उन्हें माध्यम के रूप में स्वीकार करने से कला का विस्तार हुआ, उसी प्रकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी उपकरण के रूप में अपनाया जाए तो यह सृजन प्रक्रिया में सहायक सिद्ध होगी।
डॉ. मिश्र ने कला दीर्घा, अंतर्राष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका की स्थापना, उद्देश्यों एवं यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पत्रिका स्थानीय संवेदनाओं को संरक्षित रखते हुए वैश्विक कला संवाद का सशक्त मंच बनी है तथा नई पीढ़ी के कलाकारों को दिशा प्रदान कर रही है। डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के कलाचार्य डॉ अवधेश मिश्र ने अपने व्याख्यान में उत्तर प्रदेश के समकालीन कला परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए प्रदेश के विभिन्न कला केंद्रों एवं विशेष रूप से औद्योगिक नगर कानपुर में विकसित हो रहे सृजनात्मक वातावरण की सराहना की।
गुरुकुल कला वीथिका की परंपरा और आचार्य सी. बरतरिया से लेकर आचार्य राम कंवर, आचार्य अभय द्विवेदी, आचार्य प्रेमा मिश्र, आचार्य प्रेम कुमारी मिश्र, आचार्य पूर्णिमा तिवारी, आचार्य हृदय गुप्ता, आचार्य ज्योति शुक्ला, आचार्य कुमुद बाला तथा आचार्य शुभम शिवा सहित अनेक कलाकारों के योगदान का उल्लेख किया गया। संगोष्ठी के सफल आयोजन में निदेशक डॉ. मिठाई लाल, डॉ. मंतोष यादव, डॉ. रणधीर, प्रिया मिश्रा एवं युवा कलाकारों की सक्रिय भूमिका की सराहना की गई, जिनके प्रयासों से कानपुर एक उभरते हुए कला केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के आचार्यगण, शोधार्थी, कलाकार, कलाप्रेमी एवं बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे।
