- संविधान के मूल्यों को विद्यार्थियों के जीवन का हिस्सा बनाने की पहल, राजकीय जुबिली इण्टर कॉलेज में पहली बार आयोजित हुआ ‘संविधान संवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम’
- जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की अभिनव पहल से जनपद के विद्यालयों में संवैधानिक चेतना का होगा विस्तार, तीन दिवसीय प्रशिक्षण में शामिल हुए राजकीय एवं सहायता प्राप्त विद्यालयों के प्रधानाचार्य
- संविधान की समझ केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यार्थियों के विचार, व्यवहार और जीवन का हिस्सा बने : सुमीत कुमार श्रीवास्तव, प्रधानाचार्य
लखनऊ | भारतीय संविधान केवल देश की शासन व्यवस्था का आधार नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और नागरिक उत्तरदायित्वों का जीवंत दस्तावेज है। संविधान में निहित आदर्शों और मूल्यों को समाज की नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने तथा विद्यालयों को संवैधानिक जागरूकता के सशक्त केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं अभिनव पहल करते हुए उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्वावधान में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ द्वारा राजकीय जुबिली इण्टर कॉलेज, लखनऊ ( Government Jubilee Inter College Lucknow ) में जनपद के राजकीय एवं सहायता प्राप्त विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के लिए तीन दिवसीय ‘संविधान संवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम’ का आयोजन किया गया।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव श्री कुंवर मित्रेश कुमार सिंह के निर्देशन में आयोजित इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का संयोजन जिला विद्यालय निरीक्षक के देवेंद्र पांडेय के निर्देशन में राजकीय जुबिली इण्टर कॉलेज, लखनऊ ( Government Jubilee Inter College Lucknow ) के प्रधानाचार्य सुमीत कुमार श्रीवास्तव द्वारा किया गया। विशेष उल्लेखनीय है कि जनपद के विद्यालयों के प्रधानाचार्यों को केंद्र में रखकर इस प्रकार का व्यापक संविधान संवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम पहली बार राजकीय जुबिली इण्टर कॉलेज में आयोजित किया गया। इस पहल का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था और विधिक जागरूकता के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करते हुए संविधान की मूल भावना को विद्यालयों के माध्यम से समाज के प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुंचाना है।
संविधान को समझने, आत्मसात करने और व्यवहार में उतारने पर रहा विशेष जोर
तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञ प्रशिक्षकों द्वारा भारतीय संविधान के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं, संवैधानिक दर्शन, प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों, राज्य के नीति निदेशक तत्वों, समानता के अधिकार, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, विधि के शासन तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े विषयों को सरल, सहज और व्यावहारिक तरीके से समझाया गया। प्रशिक्षण की विशेषता यह रही कि इसमें केवल संवैधानिक प्रावधानों की जानकारी देने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इस बात पर विशेष चर्चा की गई कि इन मूल्यों को विद्यालयों की दैनिक गतिविधियों, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, प्रार्थना सभा, कक्षा संवाद, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों तथा विद्यार्थियों के सामाजिक व्यवहार में किस प्रकार समाहित किया जा सकता है।
प्रशिक्षकों ने इस बात पर बल दिया कि विद्यार्थियों को संविधान के बारे में केवल जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें संविधान की भावना को समझने, उसका सम्मान करने और अपने जीवन में उसका अनुपालन करने के लिए प्रेरित करना भी आवश्यक है। विद्यालयों में समान अवसर, लैंगिक समानता, सामाजिक समरसता, भेदभाव रहित वातावरण, मानवीय गरिमा, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान की संस्कृति विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया।

विद्यालयों को संवैधानिक मूल्यों के प्रसार का प्रभावी माध्यम बनाने की पहल
प्रशिक्षण कार्यक्रम में इस महत्वपूर्ण विचार को रेखांकित किया गया कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के विचारों, मूल्यों और नागरिक चेतना पर निर्भर करता है। विद्यालय वह स्थान है जहां विद्यार्थी न केवल विषयों का ज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि सामाजिक व्यवहार, अनुशासन, लोकतांत्रिक सहभागिता, नेतृत्व, सहयोग और उत्तरदायित्व की भावना भी सीखते हैं।
इसी दृष्टिकोण के अंतर्गत प्रधानाचार्यों को प्रेरित किया गया कि वे अपने विद्यालयों में संविधान की प्रस्तावना का नियमित वाचन, मौलिक कर्तव्यों पर परिचर्चा, संवैधानिक विषयों पर निबंध एवं भाषण प्रतियोगिताएं, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी, संविधान दिवस के आयोजन तथा विधिक जागरूकता संबंधी गतिविधियों को प्रोत्साहित करें।
इसके साथ ही विद्यार्थियों को बाल अधिकारों, महिला अधिकारों, समानता, सामाजिक न्याय, साइबर जागरूकता, नशामुक्ति, बाल संरक्षण तथा नागरिक जिम्मेदारियों जैसे विषयों पर भी जागरूक करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। इस प्रकार यह प्रशिक्षण केवल प्रधानाचार्यों की क्षमता संवर्धन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि विद्यालयों के माध्यम से संवैधानिक साक्षरता को जन-जन तक पहुंचाने की एक दूरदर्शी पहल के रूप में सामने आया।
जिला विद्यालय निरीक्षक ने बताया तीन दिवसीय प्रशिक्षण का महत्व
जिला विद्यालय निरीक्षक श्री देवेंद्र पांडेय ने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम तीन दिनों तक संचालित किया गया, जिसमें जनपद के समस्त राजकीय एवं सहायता प्राप्त विद्यालयों के प्रधानाचार्यों को सम्मिलित किया गया। उन्होंने कहा कि प्रधानाचार्य किसी भी विद्यालय की शैक्षणिक एवं संस्थागत गतिविधियों के प्रमुख नेतृत्वकर्ता होते हैं। उनके माध्यम से संविधान में निहित मूल्यों, लोकतांत्रिक आदर्शों और नागरिक कर्तव्यों को विद्यार्थियों तक प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को विद्यालयों में जागरूकता, संवेदनशीलता और जिम्मेदार नागरिकता विकसित करने की दिशा में उपयोगी बताया।
प्रधानाचार्य सुमीत कुमार श्रीवास्तव ने कहा- संविधान की चेतना से ही होगा सशक्त राष्ट्र का निर्माण
राजकीय जुबिली इण्टर कॉलेज, लखनऊ के प्रधानाचार्य सुमीत कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि उनके विद्यालय में पहली बार जनपद के प्रधानाचार्यों को एक मंच पर जोड़कर इस प्रकार के व्यापक ‘संविधान संवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम’ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का संयोजन करना उनके लिए केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की दिशा में योगदान देने का महत्वपूर्ण अवसर रहा।
उन्होंने कहा कि विद्यालयों की भूमिका केवल परीक्षा परिणामों और शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक आदर्श विद्यालय वही है जो विद्यार्थियों को ज्ञानवान बनाने के साथ-साथ संवेदनशील, नैतिक, अनुशासित, न्यायप्रिय और जिम्मेदार नागरिक भी बनाए। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्श हमारे शैक्षणिक एवं सामाजिक जीवन के मार्गदर्शक सिद्धांत होने चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी यह समझे कि उसे संविधान से क्या अधिकार प्राप्त हैं और एक नागरिक के रूप में राष्ट्र, समाज तथा अन्य नागरिकों के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं। उन्होंने आगे कहा कि यदि किसी विद्यार्थी के मन में दूसरे व्यक्ति के अधिकारों के प्रति सम्मान, सामाजिक भेदभाव के प्रति असहमति, महिलाओं के प्रति समानता का भाव, विविधता के प्रति स्वीकार्यता और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व विकसित होता है, तो यही संवैधानिक शिक्षा की वास्तविक सफलता होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान को केवल 26 जनवरी या 26 नवम्बर के आयोजनों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे विद्यालय की शैक्षणिक संस्कृति और दैनिक गतिविधियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक प्रार्थना सभा, प्रत्येक कक्षा संवाद और प्रत्येक शैक्षणिक गतिविधि विद्यार्थियों में संवैधानिक मूल्यों के विकास का माध्यम बन सकती है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान एवं अनुभवों के आधार पर जनपद के सभी विद्यालय अपने यहां संविधान संवाद और विधिक जागरूकता से संबंधित गतिविधियों को और अधिक प्रभावी बनाएंगे। इससे विद्यालयों से निकलने वाली नई पीढ़ी न केवल शिक्षित होगी, बल्कि अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी करने वाली पीढ़ी के रूप में विकसित होगी।
जनपद के प्रधानाचार्यों की सक्रिय सहभागिता
इस तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में जनपद के विभिन्न राजकीय एवं सहायता प्राप्त विद्यालयों के प्रधानाचार्यों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम में पीएम श्री राजकीय सैनिक स्कूल के प्रधानाचार्य श्री अभिषेक कुमार, श्रीमती रजिया खातून, निशातगंज के प्रधानाचार्य श्री सौरभ कुमार सिंह, राजकीय विकार नगर की प्रधानाचार्या श्रीमती कुसुम वर्मा सहित अन्य प्रधानाचार्य उपस्थित रहे।
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने संवैधानिक विषयों पर चर्चा की तथा अपने-अपने विद्यालयों में संवैधानिक मूल्यों के प्रभावी क्रियान्वयन के संबंध में विचार साझा किए।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर जिला समन्वयक संतोष मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, प्रशिक्षण में योगदान देने वाले प्रशिक्षकों, जिला विद्यालय निरीक्षक, विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं सभी प्रतिभागी प्रधानाचार्यों के प्रति आभार व्यक्त किया।
शिक्षा के माध्यम से संविधान और राष्ट्र निर्माण का संकल्प
राजकीय जुबिली इण्टर कॉलेज, लखनऊ में आयोजित यह तीन दिवसीय संविधान संवाद प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षा एवं विधिक जागरूकता के समन्वय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बना। इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि संविधान की सफलता केवल उसके प्रावधानों के अस्तित्व में नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में उसके मूल्यों के वास्तविक अनुपालन में निहित है।
विद्यालयों के प्रधानाचार्य और शिक्षक इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण संवाहक हैं। उनके माध्यम से संविधान की भावना कक्षाओं तक, कक्षाओं से विद्यार्थियों तक और विद्यार्थियों के माध्यम से परिवार एवं समाज तक पहुंच सकती है। संविधान को पढ़ना ज्ञान है, उसे समझना जागरूकता है, उसके मूल्यों को आत्मसात करना संस्कार है और उन्हें अपने आचरण में उतारना सच्ची नागरिकता है।
राजकीय जुबिली इण्टर कॉलेज, लखनऊ में आयोजित इस अभिनव पहल ने इसी संकल्प को नई दिशा प्रदान की कि विद्यालय केवल शिक्षित नागरिक ही नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों से परिपूर्ण जागरूक, जिम्मेदार और राष्ट्र के प्रति समर्पित नागरिकों का निर्माण भी करें।
