नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज चिन्मय मिशन के अमृत महोत्सव ( Chinmaya Amrit Mahotsav Global Sammelan ) में शामिल हुए (Delhi: Prime Minister Narendra Modi during the inauguration of the Chinmaya Amrit Mahotsav Global Sammelan at Bharat Mandapam ) उद्औघाटन करते हुए उन्होंने अपने संबोधन में भारतीय संस्कृति का विस्तार से उल्लेख किया . उन्होंने पूज्य संतगण,आचार्यगण, चिन्मय मिशन के सभी समर्पित सेवक, देश-विदेश से आए श्रद्धालु और साधकगण को संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी के सौजन्य से आज मुझे चिन्मय मिशन के अमृत महोत्सव ( Chinmaya Amrit Mahotsav Global Sammelan ) में शामिल होने का अवसर मिला है। ये एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव है। ये हमारे संतों का मेरे प्रति विशेष स्नेह और आशीर्वाद है। क्योंकि, चिन्मय मिशन केवल एक संस्था नहीं है, ये एक चिन्मय विचार है। जिसकी स्थापना एक चिन्मय ऋषि ने की थी। इतने दशकों की इसकी यात्रा भी, चिन्मय संकल्पों से भरी रही है। और, जो चिन्मय है, वो स्वाभाविक ही अमर है, अमृतमय है। इसलिए, आज भारत मंडमप में ‘चिन्मय अमृत महोत्सव’, इस आयोजन का ये नाम भी उतना ही सार्थक है। मैं दुनिया भर में चिन्मय मिशन से जुड़े संतों और आचार्यों को, लाखों साधकों और अनुयायियों को चिन्मय अमृत महोत्सव की बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि आज यहाँ ( Chinmaya Amrit Mahotsav Global Sammelan ) आकर मुझे हृदय में जो अनुभूति हो रही थी, आधुनिक टेक्नोलॉजी के जरिए इस आयोजन ने उसे और भी जीवंत कर दिया। पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद जी के इस रूप में दर्शन, उनके होलोबॉट से संवाद करने का सौभाग्य, ऐसा लग रहा था, जैसे मैं 33 वर्ष पीछे पहुँच गया हूँ। 1993 में वडोदरा में गुरुदेव से हुई मेरी मुलाकात, उनके साथ हुई बातचीत, उनका स्नेह, उनका आशीर्वाद, आज सब कुछ फिर से आंखों के सामने आ गया। एक पल के लिए ऐसा लगा, जैसे मैं फिर से गुरुदेव के साक्षात सान्निध्य में आ गया हूँ। मेरे लिए ये बहुत भावुक करने वाला अनुभव है। मैं चिन्मय मिशन के सभी साथियों को इस अद्भुत अनुभव के लिए मैं हृदय से धन्यवाद देता हूं, उनका आभार व्यक्त करता हूं।
पूज्य गुरुदेव से मुलाकातअ का किया जिक्र
प्रधानमंत्री मोदी ने यादों को ताजा करते हुए कहा 1993 में फरवरी-मार्च के आसपास मेरी पूज्य गुरुदेव से मुलाकात हुई थी, मैं उन्हें अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद के शताब्दी समारोह में आमंत्रित करने गया था। उसी समय स्वामी विवेकानंद जी के ऐतिहासिक भाषण के 100 वर्ष हो रहे थे। पूज्य गुरुदेव ने निमंत्रण स्वीकार किया, पूज्य गुरुदेव अमेरिका गए, वहां अलग-अलग कार्यक्रमों में लगातार उन्होंने विश्व धर्मसंसद के शताब्दी समारोह के प्रति लोगों को जागरूक किया, उसमें हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया। लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था। धर्मसंसद के कुछ सप्ताह पहले ही 3 अगस्त को अमेरिका के सैन डिएगो में गुरुदेव देह त्याग करके, हम सबको छोड़ करके चले गए। 11 सितंबर को जब शिकागो में धर्मसंसद हुई, तो सौभाग्य से मैं वहीं था। हम सभी को पूज्य गुरुदेव की कमी महसूस हो रही थी। मेरे मन में गुरुदेव की कही बहुत सी बातें आ रही थीं। उनसे आखिरी मुलाकात में जो गंभीर विमर्श हुआ था, वो मुझे आज भी याद है। उसका मुख्य भाव था – युवाशक्ति का निर्माण! और, युवाशक्ति के जरिए सशक्त और समर्थ भारत का निर्माण।
विकसित भारत की यात्रा, एक साथ आगे बढ़ेगी
2047 में भारत जब अपनी आज़ादी के 100 साल पूरे करेगा, उसी कालखंड में चिन्मय मिशन भी अपनी शताब्दी का वर्ष मनाएगा। यानी, चिन्मय मिशन की शताब्दी यात्रा और विकसित भारत की यात्रा, एक साथ आगे बढ़ेगी। इसलिए, हमारे लक्ष्य भी एक हैं, उद्देश्य भी एक हैं और हमें इस यात्रा को एक साथ आगे बढ़ाना है। आपके पास गुरुदेव की महान विरासत है, दशकों का अनुभव है। दुनियाभर में समर्पित आचार्यों, साधकों और कार्यकर्ताओं का एक विशाल परिवार है। मुझे विश्वास है, आप सब मिलकर विकसित भारत के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाएंगे। इसी विश्वास के साथ मैं एक बार फिर पूज्य गुरुदेव के चरणों में नमन करता हूं। चिन्मय मिशन के सभी संतों, आचार्यों, साधकों और सेवाभावी साथियों को,अमृत महोत्सव की बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
हरि ओम।
हरि ओम।
हरि ओम।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
इस कार्यक्रम में देश विदेश से आये प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं .
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