रायपुर , 30 जुलाई , छत्तीसगढ़ सरकार ने पौधरोपण के लिए बृहद अभियान शुरू कर दिया है, वैसे भी छत्तीसगढ़ जंगलों के मामले में देश के सर्वाधिक धनी और समृद्धशाली राज्यों में से एक गिना जाता है. छत्तीसगढ़ के विशालकाय जंगल बेशकीमती पेड़ पौधे, दुर्लभ वन औषधियां और खिलखिला कर हंसते पहाड़ इस छत्तीसगढ़ की शोभा को बढ़ाते हैं. यहां के सीधे-साधे भोले और मेहनती लोग प्रकृति पूजा के अनन्य भक्त हैं और प्रकृति के लिए सर्वस्व दान करने में सबसे आगे रहते हैं .
जंगल, जमीन से प्यार का यह मुद्दा उनके जीवन मरण से जुड़ा हुआ है, लेकिन पौधारोपण में सरकारी सिस्टम ने कई मान्यताओं को हल्का करने की कोशिश की है . यह कोशिश यह है कि छत्तीसगढ़ की प्रकृति, जलवायु , जंगल के अनुरूप उन पौधों का रोपण का काम नहीं हो रहा है जिनकी यहां जरूरत होती है ,
दावडा विश्वविद्यालय रायपुर के पूर्व कुलपति और प्रख्यात वनस्पति वैज्ञानिक प्रोफेसर आरवी शुक्ल कहते हैं कि सरकार की नियत प्रकृति के अनुरूप सही नहीं लगती है , शाल – सरई के पौधे सबसे उपयुक्त होते हैं , जो न केवल अधिक पानी अवशोषित करते हैं बल्कि पानी के प्रवाह को भी रोकते हैं , जमीन की कटान को काम करते हैं और लोगों के लिए अनुकूल प्राकृतिक वातावरण तैयार करते हैं , लेकिन अफसर ने इन पौधों को नजरअंदाज करके ऐसे – ऐसे पौधों का चयन करते है जो छत्तीसगढ़ के लिए उपयुक्त नहीं हैं , .
वह पौध रोपण से जुडी एक परियोजना के बारे में बताते हैं कि बस्तर में 70- 80 के दशक में कई sसौ करोड़ की एक ऐसी परियोजना लाई गई जो छत्तीसगढ़ के जलवायु और प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल नहीं थी, यह चीड़ के पौधे लगाने की भारी भरकम योजना शुरू की गई जबकि चीड़ का पौधा छत्तीसगढ़ की जलवायु के अनुकूल नहीं होता है, प्रोफ़ेसर शुक्ल कहते हैं आजकल फि उसी तरह की चीजें चल रही है. इसलिए जरूरत इस बात की है कि स्थानीय लोगों से चर्चा विमर्श करने के बाद ही जरूरत के अनुसार पौधारोपण करना चाहिए. पौधों को उगाना, रोपण करना, देखभाल करना यह बहुत ही महत्वपूर्ण है .
प्रोफेसर शुक्ला के विचार और उनकी भावनाएं पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण और उपयोगी लगती हैं . सच में छत्तीसगढ़ में पिछले कई दशकों से ऐसा ही होता रहा है . फलदार- छायादार पेड़ बहुत जरूरी होते हैं. ये न केवल मानव जीवन के लिए उपयोगी होते हैं बल्कि पशुओं – जंगल में विचरण करने वाले जीव जंतुओं के लिए भी खाना-पीना यही पौधे उपलब्ध कराते हैं .औषधि पौधों की देखरेख उनका रोपण भी कम स्तर पर चल रहा है . हालत तो यह है कि सरकारी अफसर कई बार यूकेलिप्टिस के पौधों को भी लगाने की कोशिश करते हैं और कहीं-कहीं लगा भी देते हैं , जिसे दुनिया के कई देशों ने प्रतिबंधित कर रखा है, क्योंकि यह जल का बहुत शोषण करता है और धीरे-धीरे जल शोषण करके जमीन को बंजर की शक्ल में ला देता है. खास बात यह है कि यह पौधा लोगों के लिए उपयोगी भी नहीं है इसकी पत्तियां भी उपयोगी नहीं होती हैं लेकिन अफसरतर्क देते हैं कि यह इस पेड़ की लकड़ियाँ कागज बनाने के काम आती हैं और उद्योगों के लिए बहुत उपयोगी है इसमें कोई दो राय नहीं की उद्योग जरूरी है देश और राष्ट्र के विकास के लिए लेकिन यह किसी भी सूरत में मानव जीवन से अधिक नहीं है . इसलिए इस तरह के पौधों को लगाने से बचना चाहिए . यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार की भी है कि वह देखें की किस तरह के पौधे जरूरत है ,.
छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग प्राकृतिक जलवायु और जमीन है . कहीं बहुत अच्छी मैदानी भूमि है तो कहीं पथरीली भी . इसलिए सब जगह एक जैसे पौधे नहीं लगाया जा सकते हैं . इसलिए ग्रामीणों से, पंचायत प्रतिनिधियों से , स्कूल के शिक्षकों, कालेजों के प्रोफेसरों से और विभिन्न सामाजिक – धार्मिक संगठनों से बातचीत करने के आधार पर ही पौधारोपण के अभियान को गति देनी चाहिए. विकसित भारत 2047के लक्ष्य को पौधारोपण अभियान से जोड़ना चाहिए.
इसलिए सरकार इस अभियान के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करें तो बेहतर होगा कि पौधे स्थानीय स्तर की संरचना के रूप हो और उनकी देखभाल स्थानीय लोग ही करें और यह भी सुनिश्चित हो किन पौधों की उपयोगिता छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए कितनी है ? अगर यह संभव हो पता है तो पौध रोपण अभियान न केवल अपने शीर्ष पर पहुंचेगा बल्कि पौधे लगाने का उद्देश्य और छत्तीसगढ़ में घट रहे जंगलों में वृद्धि करने का भी एक कारगर तरीका हो सकता है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि छत्तीसगढ़ में पौधों के कटने की रफ्तार तेजी से चल रही है. तर्क औद्योगिक विकास का दिया जा रहा है , लेकिन यह समझने की जरूरत है यह औद्योगिक विकास के साथ-साथ जलवायु संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण भी उतना ही जीवन के लिए जरूरी है . इसलिए दोनों में तालमेल बनाकर के ही मानव जीवन के साथ-साथ उसके विकास की रफ्तार को संतुलित बनाए रखने की जरूरत है.
विभाग ने की अपील
महिला एवं बाल विकास विभाग ने पोध रोपण अभियान को जन आंदोलन का स्वरूप देने के लिए विद्यालयों, स्वयं सहायता समूहों, युवा मंडलों, सामाजिक संगठनों तथा आम नागरिकों से जुड़ने की अपील की है। नागरिकों से अपने घर, विद्यालय, कार्यालय एवं सार्वजनिक स्थलों पर कम से कम एक मुनगा एवं एक फलदार पौधा लगाने तथा उसकी नियमित देखभाल करने का आग्रह किया गया है। साथही ’एक आंगनबाड़ी-एक सुपोषण वृक्ष, एक परिवार-एक फलदार पौधा’ के संदेश के साथ यह अभियान पूरे जिले में निरंतर संचालित किया जाएगा। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देगी, बल्कि बच्चों एवं माताओं के बेहतर पोषण, कुपोषण में कमी तथा स्वस्थ एवं हरित समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
