100 सुनार की एक लोहार की.. वाली कहावत तो सबने सुनी ही होगी , लेकिन इस बार कुछ इससे भी ज्यादा हो गया, जब माध्यमिक शिक्षा विभाग के एक अफसर द्वारा बड़ी कुर्सी हासिल करने के लिए पिछले कई महीनो से टुकटुक कर की जा रही बैटिंग एक ही झटके में खत्म हो गयी . इस अफसर को दो दिनों से बड़े पद की बधाइयां मिल रही थी , सोशल मीडिया के हर कोने में ‘ सर की सर को बधाई’ … के साथ शेयर किया जा रही थी, लेकिन न जाने क्या से क्या हो गया कि साहब कुर्सी को दूर से ही देखते रहे और कुर्सी पास आकर भी निकल गई . अब इन साहब के समर्थक अपने ‘इन्वेस्टमेंट’ को लेकर परेशान हैं. वैसे भी सोमवार को शेयर मार्केट काफी गिर गया था, ऐसे में इन्वेस्टमेंट करने वाले परेशान है कि जब साहब की कुर्सी फिसल गई है तो उनका इन्वेस्टमेंट भी कहीं ना फिसल जाए. हालांकि साहब के जानकार बताते हैं कि वह हैं अपने नियम के पक्के. अब शुक्र मनाइए की ये नियम कुर्सी फिसलने के बाद तक जारी रहे.
शिक्षा भवन में जिले के नए मुखिया आ गए हैं . और इसके पहले के मुखिया रामनगरी में स्थानांतरित हो गए हैं . वहां तो स्थानांतरित होते ही उन पर कृपा हो गई और वह जो अब तक लखनऊ में नहीं बन पाए थे, वह बन गए हैं यानी देवीपाटन मंडल के प्रभारी JD . हालांकि विभाग चाहता तो एक ही पद से काम चल सकता था लेकिन राजधानी लखनऊ में उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियां व अनुकरणीय कार्यों के कारण दो पद प्रदान किए हैं, उनकी उपलब्धियां में शिक्षकों के प्रमोशन, वेतन विसंगति, विद्यालयों के प्रबंधन में विवाद,शिक्षकों के ट्रान्सफर में दान पुण्य जैसे कई अनगिनत मामले हैं. शिक्षा भवन में अब आने वाले नए मुखिया के लिए यही सब चीजें रामबाण होने वाली हैं मतलब जरूरत के हिसाब से इन फाइलों से “अमृत ” निकलेगा जैसे पूर्ववर्ती ने अमृत निकाला और निकल गए .
लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों के धरना प्रदर्शन थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. छात्र कभी फीस वृद्धि के विरोध में तो कभी सीटों और कई अन्य तरह की समस्याओं को लेकर. एक दिन तो हद ही हो गई जब छात्रों ने मुखिया के दफ्तर के चैनल की ऐसी की तैसी कर दी, आसपास सुरक्षा कर्मी भी कहीं नहीं दिखे और छात्र अपना गुस्सा मुख्य द्वार पर निकालते रहे , यह एक दिन का नहीं कई दिनों से ऐसा ही कुछ है और कानून व्यवस्था संभालने वाले प्रोफेसर साहब इतना परेशान हो गए हैं कि वे समझ नहीं पा रहे हैं किस छात्र संगठन को प्रदर्शन करने दें या उसे रोकें ? उन्हें तो यह डर सताता है कि जिस ठप्पे के कारण उन्हें कानून के रखवाले की कुर्सी मिली है , कहीं उसे पर ही छात्र हमला ना बोल दें . ऐसे में वह भी खूब संभल कर ही छात्रों के साथ व्यवहार करते हैं और नोटिस देने में भी देखते हैं कि उसका बैक ग्राउंड कैसा है ?
लखनऊ विश्वविद्यालय में कर्मचारी परिषद की निर्वाचित कार्य समिति भंग करने के बाद चुनाव कराने की घोषणा हवा हवाई साबित हो रही है. कर्मचारी आदेश जारी करने वाली अफसर से सवाल पूछ रहे हैं कि चुनाव कब होंगे ? विश्वविद्यालय अपने ही आदेश पर अमल नहीं कर रहा है. अब तो कर्मचारियों को आभास होने लगा है कि कर्मचारी की एकता को खंडित करने के लिए जानबूझकर कुछ कथित नेताओं के चक्कर में विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह दांव चला था और उसका परिणाम भी अब दिख रहा है, क्योंकि मृतक आश्रित कर्मचारियों को चपरासी बना दिया गया जबकि वे पात्रता क्लर्क की रखते हैं लेकिन मजाल है कि विश्वविद्यालय के मुखिया के मुंहलगे और उनकी हां में हम मिलने वाले कथित कर्मचारी हितेषी आवाज़ उठाएं। प्रशासनिक भवन में यह चर्चा आम है कि अभी तो यह शुरुआत है . कर्मचारियों के लिए अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं उनकी उनसे जुड़े कई ऐसे फैसले लिए जाने वाले हैं जो उनके हितों पर कुठाराघात करेंगे. फिलहाल संविदा व आउटसोर्सिंग कर्मचारी नियमित वेतन पाने की जुगत में लगे हैं देखना यह है कब होते हैं ?
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