- हिंदी प्रकोष्ठ, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ
- प्रेमचंद की लेखनी आज भी समाज को नई दिशा देने में सक्षम : प्रो. सुनीता मिश्रा
लखनऊ, 03 अगस्त । उपन्यास सम्राट एवं युगद्रष्टा साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वानों ने उनके साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीर मंथन किया। विश्वविद्यालय के हिंदी प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित “प्रेमचंद जयंती समारोह” के अंतर्गत “समकालीन विमर्श : प्रेमचंद” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में प्रेमचंद के साहित्य को सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना, राष्ट्रीय चेतना और भारतीय जीवन-मूल्यों का सशक्त दस्तावेज बताया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन तथा विश्वविद्यालय कुलगीत के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने की। मुख्य अतिथि के रूप में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. शैलेन्द्र नाथ मिश्र (पूर्व विभागाध्यक्ष, लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय, गोंडा) तथा प्रो. राम पाल गंगवार, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय ने अपने विचार व्यक्त किए।

संगोष्ठी के संयोजक डॉ. बलजीत श्रीवास्तव ने स्वागत एवं विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि प्रेमचंद भारतीय साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक रचनाकार हैं, जिन्होंने साहित्य को समाज परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया। उनकी रचनाएँ आज भी सत्य, करुणा, समरसता, नैतिकता और राष्ट्रधर्म का संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों को आत्मसात करने का संकल्प दिवस है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कार्यवाहक कुलपति प्रो. सुनीता मिश्रा ने कहा कि प्रेमचंद की कालजयी विचारधारा आज भी समाज को नई दिशा देने में सक्षम है। उनका साहित्य मानवीय संवेदना, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय चेतना का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को स्वर दिया और भारतीय समाज को नैतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने विद्यार्थियों से प्रेमचंद के साहित्य का गंभीर अध्ययन करने का आह्वान करते हुए हिंदी प्रकोष्ठ की साहित्यिक एवं अकादमिक गतिविधियों की सराहना की।
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