
आज़ादी का अमृत महोत्सव वर्ष,नित्य नूतन राष्ट्रीय एकात्मता के प्रयास में जुड़ती संवरती भारत माता की प्रतिमा में भारतीय जनमानस का योगदान निरंतर बढ़ता जा रहा है। भारत अनेक भाषाओं की जननी है सनातन प्राचीन राष्ट्र, महर्षि पाणिनि,पतंजलि जैसे विद्वानों की भाषा संस्कृत होने के साथ उसका सरल रूप हिंदी रहा, चाहें चंद्रगुप्त मौर्य के बृहत्तर भारत की मगधी हो या महाकवि तुलसी दास जी की अवधी , सबमें देवनागरी लिपि का उपयोग हुआ। आज एथनोलॉग के अनुसार विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है।
वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने इसे जनमानस की भाषा कहा था और इसे देश की राष्ट्रभाषा भी बनाने को कहा था। लेकिन आजादी के बाद ऐसा कुछ नहीं हो सका। सत्ता में आसीन लोगों और जाति-भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों ने कभी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया। आज गुलाम अंग्रेजी मानसिकता के कारण हिंदी उपेक्षित होने के बाद भी राष्ट्रीय एकता की सूत्रधार बनती जा रही है। आज हर भारतीय नेता हिंदी में भाषण करना चाहता है। जन मानस की व्याप्ति के कारण ट्यूट भी हिंदी में हो रहे है। टीवी सिरियल हो या सिनेमा जगत सभी क्षेत्रों में हिंदी की उपयोगिता बढ़ रही है।
देशप्रेमी कवियों ने किया प्रयास
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त,रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास और व्यौहार राजेन्द्र सिंह आदि लोगों ने बहुत से प्रयास किए। इन्होंने उत्तर से दक्षिण तक भारत कीअनेक यात्राएँ कर प्रयास भी किये।
अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन और हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए हर साल 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है।आजादी मिलने के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था और इसके बाद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। अगर देखे तो 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा श्री राजेन्द्र सिंहा का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया था।
२६ जनवरी १९५० को राजभाषा नीति भी हुई
26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ साथ राजभाषा नीति भी लागू हुई। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप है। हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का प्रयोग भी सरकारी कामकाज में किया जा सकता है। अनुच्छेद 343 (2) के अंतर्गत यह भी व्यवस्था की गई है कि संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक, अर्थात वर्ष 1965 तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए पहले की भांति अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग होता रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी कि इस बीच हिन्दी न जानने वाले हिन्दी सीख जायेंगे और हिन्दी भाषा को प्रशासनिक कार्यों के लिए सभी प्रकार से सक्षम बनाया जा सकेगा।
बनाया गया आयोग
अनुच्छेद 344 में यह कहा गया कि संविधान प्रारंभ होने के 5 वर्षों के बाद और फिर उसके 10 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे, जो अन्य बातों के साथ साथ संघ के सरकारी कामकाज में हिन्दी भाषा के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में और संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर रोक लगाए जाने के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश करेगा। आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए इस अनुच्छेद के खंड 4 के अनुसार 30 संसद सदस्यों की एक समिति के गठन की भी व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 120 में कहा गया है कि संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है।
वर्ष 1965 तक 15 वर्ष हो चुका था, लेकिन उसके बाद भी अंग्रेजी को हटाया नहीं गया और अनुच्छेद 334 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह 1965 के बाद भी सरकारी कामकाज में अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखने के बारे में व्यवस्था कर सकती है। पर पूर्ववर्ती सरकारों ने “एक राष्ट्र ,श्रेष्ठ राष्ट्र ” बनाने की दिशा में प्रयास ही नहीं किया।
1967 में संसद में “भाषा संशोधन विधेयक” लाया गया। इसके बाद अंग्रेज़ी को अनिवार्य कर दिया गया। इस विधेयक में धारा 3(1) में हिन्दी की चर्चा तक नहीं की गई। इसके बाद अंग्रेज़ी का विरोध शुरू हुआ। वर्ष 1990 में प्रकाशित एक पुस्तक “राष्ट्रभाषा का सवाल” में शैलेश मटियानी जी ने यह सवाल किया था कि हम 14 सितम्बर को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं। इस पर प्रेमनारायण शुक्ला जी ने हिन्दी दिवस के दिन इलाहाबाद में इसके कारण को बताया था कि इस दिन ही हिन्दी भाषा के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। इस कारण इस दिन को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। लेकिन वे इस जवाब से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि इस दिन को हम राष्ट्रभाषा या राजभाषा दिवस के रूप में क्यों नहीं मनाते हैं।
अटल जी संयुक्त राष्ट्रसंघ में दे चुके हैं हिंदी में वक्तव्य
आज नरेंद्र मोदी जी प्रयास कर भारतीय भाषाओं के विकास के साथ हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत है । स्व.पं अटल बिहारी वाजपेयी जी ने पहली जब संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण किया तो भारतीयों का सिर गर्व से ऊंचा हो गया था ,उसके बाद देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी निरंतर अंतर्राष्ट्रीय मंचो से हिंदी की गरिमा को बढ़ा रहे है ,देश मे हिंदी संस्थानों में नये शोध ,प्रकाशन निरंतर बढ़ रहे है। आधुनिक तकनीकी क्षेत्र में भी हिंदी की निरंतर सक्रियता बढ़ रही है। आज भारत एक देश,एक संविधान, एक पहचान पत्र,एक राशन कार्ड,एक मतदान कार्ड, एक शिक्षा आदि एकात्मता को गति दी जा रही है । वैसे ही देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली भाषा, भारत,नेपाल,दक्षिण अफ्रीका,पाकिस्तान आदि देशों में बोली जाती है।
भारत में 80 फीसदी हिंदी लिखने-बोलने लगे हैं
2011 की भारतीय जनगणना में 57.1% हिंदी जानते थे जो आज बढ़कर एक सर्वे के अनुसार 80% भारतीय हिंदी लिखने बोलने लगे है। पर आज हिन्दी दिवस का संकल्प अभी भी अभिजात्य वर्ग, बुद्धिवादी एक बड़े वर्ग के लिए हीनता का विषय बना हुआ है ।इस भ्रांति को तोड़ते हुए तकनीक, विज्ञान, विधि , न्याय की भाषा हिंदी को बनाने के लिये जनभागीदारी की आवश्यकता है। हिंदी ही हमारी संस्कृति की सरल, सहज, वैज्ञानिक भाषा बन इस देश को एकात्मता की सूत्रधार बने,यही हिंदी हित का संकल्प होगा। (लेखक राज कुमार, प्रबंध संपादक कमल ज्योति, लखनऊ के अपने विचार हैं। )
