- कहा – भाषा और साहित्य का विस्तृत दायरा न्यायिक व्यवस्था की विश्विक दक्षता से जुड़ा है।
लखनऊ, 10 अप्रेल , “इंग्लिश लैंग्वेज एजूकेशन फॉर सस्टेनेबल फ्यूचर्स: टेक्नोलॉजी, कल्चर एंड ग्लोबल कॉम्पिटेंस” विषय पर आधारित पहली ग्लोब 2026 ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन 9 अप्रैल 2026 को इंडोनेशिया के यूनिवर्सिटीज हरपन बांगसा द्वारा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से किया गया। इस सम्मेलन में विश्वभर के प्रख्यात शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं एवं विद्वानों ने भाग लिया तथा बदलते वैश्विक परिदृश्य में अंग्रेज़ी भाषा शिक्षा के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श किया।
The 1st GLOBE 2026 Online International Conference : डॉ. अलका सिंह, अंग्रेज़ी विभाग, डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्विद्यालय, लखनऊ की प्राध्यापिका, ने इस सम्मेलन में एक विशिष्ट पैनल वक्ता के रूप में सहभागिता की तथा “लैंग्वेज इन लिट्रेचर: रिकॉग्नाइजिनग़ मीनिंगफुल डिस्कोर्सेज टू ए सस्टेनेबल एजुकेशन एंड लीगल स्ट्डीज” विषय पर अपना महत्वपूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया।
अपने वक्तव्य में डॉ. सिंह ने भाषा, साहित्य और विधि के समन्वय पर आधारित अंतःविषयक (Interdisciplinary) दृष्टिकोण की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि साहित्य जहाँ सांस्कृतिक स्मृति और नैतिक संवेदनशीलता का संवाहक है, वहीं विधि न्याय, समानता और शासन के सिद्धांतों को स्थापित करती है। इन दोनों के समन्वय से शिक्षा केवल कार्यात्मक साक्षरता तक सीमित न रहकर आलोचनात्मक चिंतन, नागरिक उत्तरदायित्व और वैश्विक दक्षता का विकास करती है।
डॉ. सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि भाषा किस प्रकार सार्थक विमर्शों को जन्म देती है, जो समकालीन वैश्विक चुनौतियों—जैसे मानवाधिकार, पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक न्याय—से जुड़ते हैं। उन्होंने शिक्षार्थियों को नैतिक, सजग और वैश्विक नागरिक के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, उन्होंने तकनीक की भूमिका को भी रेखांकित किया, जो अंतर-सांस्कृतिक संवाद को सशक्त बनाती है और वैश्विक शैक्षणिक सहयोग को संभव करती है।
डॉ. अलका सिंह ने बताया कि सम्मेलन ( The 1st GLOBE 2026 Online International Conference) का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि सहयोगात्मक शोध और अंतःविषयक दृष्टिकोण के माध्यम से समावेशी, सतत एवं वैश्विक रूप से सक्षम शैक्षिक प्रणाली की आवश्यकता है। डॉ. सिंह की सक्रिय भागीदारी ने न केवल वैश्विक मंच पर भारत की शैक्षणिक उपस्थिति को सुदृढ़ किया, बल्कि सतत भविष्य के निर्माण में मानविकी और विधि अध्ययन के समन्वय की आवश्यकता को भी प्रभावी रूप से रेखांकित किया।
