खनऊ . उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव ( Lucknow MLC Election) में लखनऊ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे विभिन्न संगठनों के प्रत्याशियों और निर्दलीय उम्मीदवारों की कोशिश हर मतदाता तक पहुंच कर अपने लिए मत एवं समर्थन जुटाना है. मत एवं समर्थन मांगते समय यह प्रत्याशी अपने संगठन की उपलब्धियां भी बता रहे हैं और जीत के बाद किए जाने वाले कार्यों की भी अभी से जानकारी दे रहे हैं , लेकिन शिक्षकों के बीच एक सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रमुख उम्मीदवारों के चेहरे लखनऊ के शिक्षा भवन में किसी धरना प्रदर्शन या फिर शिक्षकों की समस्याओं के निराकरण के लिए अफसर से भेंट मुलाकात करते देखा गया है?
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सवाल यह भी है कि अगर वास्तव में इन प्रमुख उम्मीदवारों ने अब तक शिक्षकों की समस्याओं के लिए आवाज उठाई होती तो लखनऊ के शिक्षा भवन में जहां जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS ), मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक (JD )मंडलीय उप शिक्षा निदेशक (DDR ) जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA ) मंडलीय सहायक शिक्षा निदेशक (AD Basic )जैसे जिला और मंडल स्तर की वरिष्ठ अधिकारी बैठते हैं, वहां पेंशन, वेतन, प्रमोशन के लिए आए दिन शिक्षकों को चक्कर नहीं लगाना पड़ता . इतना ही नहीं इस समय भी जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS ) , जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय (BSA ) और मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक कार्यालय (JD) में शिक्षकों से सम्बंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं का अंबार लगा हुआ है , लेकिन इन समस्याओं के समाधान के लिए किसी भी शिक्षक प्रत्याशी ने उतनी तत्परता नहीं दिखाई जितनी दिखानी चाहिए थी. इनमें वे भी पदाधिकारी शामिल है जो शिक्षकों की समस्याओं के समाधान करने का दावा करते हैं .
शिक्षक चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षकों की समस्याओं को लेकर कहीं से आवाज नहीं उठाई जा रही है. शिक्षकों की वेतन वितरण अधिनियम से लेकर महत्वपूर्ण सुविधाओं पर डाका डाला जा रहा है . कई जगह बर्खास्त किया जा चुका है , निलंबित किया जा रहा है , तरह-तरह प्रताड़ित करने के लिए नोटिस भी दी जा रही है , अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब लखनऊ के महाराजा अग्रसेन विद्यालय इंटर कॉलेज मोती नगर के शिक्षकों को 5 सितंबर शिक्षक दिवस पर भी वेतन नहीं मिल पाया , मामला मीडिया में उठा तो 10 दिन बाद शिक्षकों के वेतन भुगतान की स्थिति बन पाई, वेतन भुगतान रोकने का कोई भी कारण जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय की ओर से नहीं बताया गया| यहां तक कि प्रधानाचार्य से भी सवाल जवाब किए गए और प्रधानाचार्य ने शिक्षकों के साथ शिक्षा भवन पहुंचकर अपनी सफाई भी पेश की लेकिन फिर भी वेतन वितरण में विलंब किया गया | यह वेतन रोकने की कोई ठोस वजह, कोई कानूनी बाधा भी जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय नहीं बता पाया .
यह तो एकमात्र उदाहरण है | राजधानी में एक नहीं अनगिनत ऐसे शिक्षक हैं, जिनकी समस्याएं लगातार लंबित है | महीने दो महीने की बात छोड़िए साल बीतने को जा रहा है, लेकिन उनकी फाइलें जिला विद्यालय शिक्षक कार्यालय (DIOS ) में लंबित पड़ी हुई है | शिक्षा विभाग के अधिकारी भी उन फाइलों पर तवज्जो नहीं देते हैं, जिनमें सामान्य शिक्षकों के मामले जुड़े हुए हैं | अधिकारी तो सिर्फ सिफारिश या फिर अन्य प्रकार से आए प्रकरणों को ही देखते और निस्तारित करने में रुचि दिखाते हैं|
लखनऊ में माध्यमिक शिक्षक संघ शर्मा गुट , पांडेय गुट या कुछ अन्य संगठनों द्वारा ही जब तब शिक्षकों की समस्याओं को उठाया जाता रहा है लेकिन इन संगठनों की भी सीमित क्षमता होने के कारण शिक्षकों की समस्याएं उतनी तेजी से निस्तारित नहीं हो पाती हैं , जितनी होनी चाहिए . अब ऐसे में शिक्षक निर्वाचन के चुनाव में शिक्षकों की समस्याओं को उठाने और समाधान के लिए ठोस प्रयास होते नहीं दिख रहे हैं महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षकों के बीच वोट मांगने जा रहे प्रत्याशियों के पास इन लंबी समस्याओं के समाधान का रोड मैप क्या है ?
सवाल तो यह भी है कि इनसे कितने उम्मीदवारों ने अब तक इन शिक्षक समस्याओं के लिए प्रमुख उम्मीदवारों ने कितनी बार शिक्षा विभाग के यहां धरना प्रदर्शन किया शायद शिक्षक मतदाताओं ने भी इनमें से कई को उन्हें कभी शिक्षा भवन में नहीं देखा होगा . यह धरना प्रदर्शन की तो बात छोड़ दीजिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों को दस पांच चिट्ठी पत्री भी नहीं लिखी होगी. इनमें कोई एक जीत भी सकता.ऐसे में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि शिक्षकों की समस्याओं के समाधान के लिए क्या शिक्षकों को यूं ही भटकते रहना पड़ेगा चुनाव आते जाते रहेंगे | वे मतदाता के रूप में मत व समर्थन देते रहेंगे लेकिन उनकी वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए ठोस प्रयास नहीं किए जाएंगे और उन्हें नोटिस , निलंबन, वेतन वितरण में देरी जैसी अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ेगा.
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