लखनऊ | डिफेंडर, इनोवा और स्कॉर्पियो जैसी महंगी गाड़ियों के काफिले के साथ कई शिक्षक नेता चुनाव लड़ रहे हैं . लखनऊ खंड में शिक्षक विधायक बनने के लिए उम्मीदवारों ने पूरी ताकत झोंक दी है. लेकिन अब पुराने जमाने लद गए जब एक मोटरसाइकिल या पुराने चार पहिए वाहन पर शिक्षकों से वोट और समर्थन के लिए विद्यालय से घर तक उम्मीदवार पहुंच जाया करते थे |
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!अब वक्त ने ऐसा बदलाव दिखाया है कि वास्तविक शिक्षक चुनावी चकचौंध देखकर हैरान और परेशान से हैं .एक वरिष्ठ शिक्षक नेता बताते हैं कि यह सब देख कर शिक्षकों की समझ में ही नहीं आ रहा है कि करोड़ों रुपए की गाड़ी से चुनाव प्रचार कर रहे इन उम्मीदवारों में से किसी के विधायक बनने के बाद हम उन तक पहुंच भी पाएंगे या नहीं ? आखिर पिछले दशकों में विजयी उम्मीदवारों ने शिक्षकों के लिए क्या कुछ किया है ? इसकी फेहरिस्त विधान परिषद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे अधिकांश उम्मीदवार सार्वजनिक करने में की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. प्रमुख शिक्षक उम्मीदवारों ने पिछले सालों में शिक्षक हित में किए गए कार्यों की एक आदर्श सूची भी नहीं दे पा रहे हैं ? एक सेवानिवृत प्रधानाचार्य बताते हैं कि इसी लखनऊ में एक शिक्षक नेता साईकिल और बाइक से वोट मांगकर विधान परिषद् पहुंचे थे. वे पहले क्लास लेते थे फिर विधान परिषद् पहुँचते थे लेकिन अब सब कुछ बदल गया .
जीतने के बाद क्या करेंगे ? नहीं बता रहें
प्रमुख उम्मीदवारों के पास यह भी बताने के लिए ख़ास कुछ नहीं है कि चुनाव जीतने या फिर चुनाव हारने के बाद शिक्षकों के बीच किस प्रकार से उनके हितों की लड़ाई लड़ेंगे ? महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उम्मीदवार अपने-अपने संगठनों के प्रति समर्पित होकर केवल संगठन के झंडे पर ही काम कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वर्तमान समय में शिक्षकों की तमाम जरूरी सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं .
इन समस्याओं पर कौन चर्चा करेगा ?
आज स्थिति यह है कि कई विद्यालयों के शिक्षकों को वेतन के लिए कई महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है , बिना जरूरी कारण के प्रधानाचार्य को नोटिस दिया जा रहा है , कार्यकारी प्रधानाचार्य को उनके पद नाम के रूप वेतन नहीं दिया जा रहा है . इसी प्रकार से विद्यालयों में रिक्त पदों के अनुरूप भर्ती न होने से भी शिक्षण कार्य प्रभावित होने जैसी कई समस्याएं हैं, लेकिन इन समस्याओं की उम्मीदवारों द्वारा किसी प्रकार की चर्चा नहीं की जा रही है. न ही इससे चुनाव में मुद्दा बनाया जा रहा है .
भारी भरकम काफिला लेकर चल रहें
विभिन्न दलों के उम्मीदवार भारी भरकम काफिले के साथ चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं .उनके काफिलों पर गौर करेंगे तो शिक्षकों से कहीं ज्यादा उनके समर्थक पार्टी कार्यकर्ता ही नजर आ रहे हैं.इन काफिलों में शामिल लोग विद्यालयों में पहुंचकर शिक्षकों से संपर्क कर रहे हैं अपने उम्मीदवार के लिए वोट मांग रहे हैं लेकिन शिक्षकों के हित की बात नहीं हो रही है.
आदर्श चुनाव दलीय राजनीति में तब्दील
शिक्षक संघ के चुनाव में शिक्षकों के हितों की अनदेखी हो रही है . एक आदर्श चुनाव के रूप में लड़ा जाने वाला यह चुनाव दलीय राजनीति में तब्दील है . यही कारण है कि इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी अपनी नीतियों के अनुरूप ही वोट और समर्थन मांग रहे हैं, जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि शिक्षकों की समस्याएं अन्य समस्याओं से मेल कम खाती है. शिक्षकों के चुनाव की एक अपनी मर्यादा होती है और शिक्षकों के मान सम्मान के साथ ही उन्हें विद्यालयों में शिक्षण कार्य करना होता है . यही कारण है कि शिक्षक समस्याओं से तो घिरे ही हैं , उनके मान सम्मान और शिक्षक पेशे पर भी लगातार चोट की जा रही है.
