

- उत्तम मार्दव धर्म पर और विस्तृत वर्णन करते हुए जैन मिलन समिति के पूर्व उपाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी दिनेश जैन ने बताया कि मान कषाय के कारण ,आत्म स्वभाव में विद्यमान कोमलता का अभाव हो जाता है ,तो उसमें अकड़ उत्पन्न हो जाती है।
कोरबा , 29 अगस्त , क्षमा के समान मार्दव भी आत्मा का स्वभाव है। मार्दव स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो मान के अभावरूप, शांतिस्वरूप पर्याय प्रकट होती है उसे मार्दव धर्म कहते हैं। मनुष्य जीवन में यदि हमने अपने आप को ढाल लिया तो जीवन सार्थक बन जाता है। दशलक्षण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म का पालन किया जाता है। यह धर्म हमें हमारे मन की मलीनता को खत्म कर जीवन को सुगंधित करने की सीख देता है। उत्तम मार्दव धर्म मनुष्य को अपने भीतर के क्रोध, कषाय, छल- कपट आदि खत्म कर चंदन की तरह सुगंधित जीवन जीने का ज्ञान देता है।
उक्त विचार बुधवारी बाजार स्थित दिगंबर जैन मंदिर में संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज, आचार्य श्री 108 समय सागर महाराज जी एवं आर्यिका रत्न श्री 105 आदर्श मति माताजी के मंगल आशीर्वाद से विगत दो माह से चल रहे चातुर्मास में विराजमान आर्यिकारत्न श्री 105 अखंडमति माताजी एवं आर्यिका रत्न श्री 105 अभेदमति माताजी ने दशलक्षण पर्व की दूसरे लक्षण उत्तम मार्दव धर्म पर प्रवचन के दौरान बताया कि उत्तम मार्दव धर्म क्रोध ,मान, कषाय, छल- कपट को खत्म कर मनुष्य के जीवन को चंदन की तरह सुगंधित बनाता है।
उत्तम मार्दव धर्म पर और विस्तृत वर्णन करते हुए जैन मिलन समिति के पूर्व उपाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी दिनेश जैन ने बताया कि मान कषाय के कारण ,आत्म स्वभाव में विद्यमान कोमलता का अभाव हो जाता है ,तो उसमें अकड़ उत्पन्न हो जाती है। मान कषाय के कारण मानी अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा समझने लगता है। उसमें समुचित विनय का अभाव हो जाता है। मान के खातिर वह छल-कपट करने लग जाता है। मान भंग होने पर वह क्रोधित हो उठता है ।सम्मान प्राप्ति के लिए वह सब कुछ करने को तैयार रहता है ।मार्दव धर्म में आज मैं को हटाने का दिन है ।मान का प्रवचन सरल है ,परंतु उसको छोड़ना कठिन है ।अहंकार की मृत्यु पर सत्य की विजय है ।आज का मानव अहंकार की कठपुतली बन गया है।

मार्दव धर्म का जीवन में यदि पालन करना है या जीवन में उतारना है, तो नम्र होना आवश्यक है ।बीज जब अस्तित्व मिटाता है ,तभी वह वृक्ष बनता है। मार्दव धर्म ,अहंकार और मान को विसर्जित करने का तरीका है। उत्तम मार्दव धर्म क्रोध, छल, कपट, कषाय को खत्म कर मनुष्य के जीवन को चंदन की तरह सुगंधित बनाता है। इसके बिना मनुष्य को सम्यकदर्शन पाना संभव नहीं है ।मृदुता का भाव ही मार्दव धर्म है ।इसके पालन से तीर्थंकर भगवान के उपदेशों को पाना आसान है।
इस प्रकार के उक्त विचार एवं भावों को ग्रहण करने हेतु समस्त जैन समाज की महिलाओं व पुरुष प्रातकाल से ही दिगंबर जैन मंदिर में उपस्थित हुए।प्रातः 7:00 बजे से श्री जी की स्थापना श्री राहुल जैन, महेंद्र जैन, वर्षाजैन, पर्व ने की एवं श्री जी का अभिषेक श्री प्रमोद जैन ट्रांसपोर्ट नगर ने किया। प्रथम शांति धारा डॉक्टर प्रदीप जैन, डॉक्टर प्रिंस जैन ने की ।द्वितीय शांतिधारा श्री ओमप्रकाश जैन ने की ।श्रीजी पर छत्र श्री राकेश जैन, नीता ,मयंक, शुभांक ने चढ़ाया ।तत्पश्चात् श्री जी की आरती नवोदितजैन ,मुकलेश जैन,साक्षी जैन ने की ।तत्पश्चात् आर्यिका रत्न श्री 105 अभेद मति माताजी का प्रवचन हुआ। जिसमें जैन मिलन समिति के समस्त पदाधिकारी एवं समस्त जैन समाज के लोग उपस्थित हुए उक्त समस्त जानकारी पूर्व उपाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी दिनेश जैन ने दी।
