नई दिल्ली, 02 अगस्त , केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र को सबसे बड़ी जीत बताने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के नेता नित नई मांगों को रखने लगे हैं , उनके समर्थन में आए विपक्षी दल भी अब धर्मेंद्र प्रधान की त्यागपत्र से आगे की बात करने लगे हैं . सड़क पर उतरने की धमकी भी देने लगे हैं , इन्हें केंद्र सरकार के फैसलों से संतुष्टि नहीं मिल रही है .
ऐसे में स्पष्ट है कि धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र विपक्ष के लिए कोई मायने नहीं रखता जबकि शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय कार्यों को अचानक विराम दे दिया गया. ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि मोदी सरकार को धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर पुनर्विचार करना चाहिए अगर जिन आन्दोलनकारी दलों को संतुष्ट करने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र दिया गया (हालांकि प्रधान का कहना कि खुद आहत होकर दिया था ) और आन्दोलनकारी लोग संतुष्ट नहीं हैं तो फिर इस इस्तीफा का औचित्य क्या है ? सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र का परिणाम क्या है अगर धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद पेपर लीक मामले को लेकर केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से कॉकरोच जनता पार्टी के नेता संतुष्ट होते और विपक्ष भी संसदीय मर्यादा में रहकर कामकाज करता तो स्थिति बेहतर हो सकती थी. साथ ही भविष्य में पेपर लीक की संभावनाओं को कम करने , पेपर लीक जैसे पाप कार्य में शामिल होने वाले लोगों के खिलाफ कठोरता कार्रवाई करने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय हो चुके हैं और इसमें विपक्ष पूरी तरीके से अपनी सहभागिता सुनिश्चित करता लेकिन दिनों दिन हालात बदल रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ जिस प्रकार की निम्न स्तर की भाषा का इस्तेमाल किया गया और हैरत की बात यह है , निम्न भाषा का बचाव करने के लिए भी विपक्ष के कुछ स्वनामधन्य नेता आगे-आये हैं , वे इन्हें भोले वाले बच्चे कह रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि संसद में भी ऐसा ही होता है तो इसका असर बच्चों पर क्यों नहीं पड़ेगा ? तो सवाल यह है कि संसद में कौन करता है ? पक्ष और विपक्ष दो ही पक्ष वहां होते हैं और दोनों ही पक्षों के लोग अगर संसद में इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं तो वह खुद क्यों नहीं अपनी पार्टी के प्रतिनिधियों को रोकते हैं ? जिम्मेदारी सत्ता और विपक्ष दोनों की है ऐसे में किसी अभद्र भाषा , टिप्पणियों का बचाव करना देश की लोकतांत्रिक परंपराओं का घोर उल्लंघन है .
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बड़ा दिल दिखाया
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बड़ा दिल दिखाते हुए उन सभी युवाओं को माफ कर दिया है जिन्होंने न केवल उन्हें अपितु उनके परिवारजनों को भी अभद्र मर्यादित और अलोकतांत्रिक तरीके से सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया . हैरत है कि देश के प्रधानमंत्री के प्रति इस तरह के कटु शब्दों का उपयोग क्या सिर्फ इसलिए किया जाना उपयुक्त होगा कि वह ऐसे लोगों की विचारधारा के नहीं हैं ? अपने-अपने संगठनों का बिल्ला लगाकर जंतर मंतर पर गालियां देना, लाउडस्पीकर में अलग तरह की भाषा के इस्तेमाल करना और फिर खुद को देश प्रेमी, देश हितैषी युवा बताते हुए भाषण देना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता है .
जाँच और दंड जरूरी
हालांकि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के वक्तव्य के बाद गालियां देने वालों के खिलाफ कार्रवाई कम होगी लेकिन यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है . ऐसे युवाओं को कठोर सजा देनी ही चाहिए और जब पुलिस की कार्रवाई शुरू हुई तो ऐसे युवा माफी की मुद्रा में है, लेकिन सवाल यह भी है कि उनके वीडियो बनाने वाले , वीडियो वायरल करने वाले लोग कौन है ? क्या इन लोगों ने एक ऐसी योजना तैयार की थी जिसमें वह खुद बोलेंगे और वीडियो बनाने वाला ही उसको वायरल करेगा या फिर वीडियो बनाने वाले ने ही इनको प्रेरित किया कि वह प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करें ? यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है और केंद्र सरकार की प्रमुख एजेंसियों को चाहिए कि इस पहलू से जुड़े तत्वों – गालियां देने वालों और गलियों को रिकॉर्ड करके महिमा मंडित करने वाले लोगों की शिनाख्त होनी चाहिए और ऐसे तत्वों के खिलाफ विधि सम्मत कार्रवाई सुनिश्चित करना चाहिए.
ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि देश की मर्यादा , देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को बचाए रखना है, बल्कि इसलिए भी जरूरी है कि भविष्य में सत्ता पक्ष या विपक्ष का कोई भी नेता किसी के बारे में इस प्रकार की गालियाँ देने से से पहले 10 बार सोचे .अगर आज दी गयी गलियों की सजा उन्हें कानून के दायरे में लाकर नहीं दी गयी तो सामाजिक मर्यादाएं कहाँ बच पाएंगी .
