

- मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सुशील चन्द्र त्रिवेदी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. पवनपुत्र बादल (प्रबंधक-राष्ट्रधर्म एवं राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद) रहे।
- अकादमिक सत्र की अध्यक्षता प्रो. शर्वेश पाण्डेय (प्राचार्य, डी.एस.के., मऊ) ने की। इस सत्र में डॉ. शिवानी कटारा (लेखिका एवं समाजसेविका) तथा डॉ. विपिन झा (संस्कृत विभाग, बी.बी.ए.यू.) ने विचार व्यक्त किए।
लखनऊ, 26 सितम्बर , बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ( Babasaheb Bhimrao Ambedkar University lucknow ) के हिन्दी प्रकोष्ठ द्वारा “भारतीय ज्ञान परम्परा और हिन्दी साहित्य” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय के पुराने प्रशासनिक भवन सभागार में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ पूर्वाह्न 10:30 बजे हुआ।उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सुशील चन्द्र त्रिवेदी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय साहित्य परिषद) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. पवनपुत्र बादल (प्रबंधक-राष्ट्रधर्म एवं राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद) रहे। उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह (पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने अपने व्याख्यान में भारतीय ज्ञान परम्परा की गहराई, उसकी मौलिकता तथा आधुनिक सन्दर्भों में उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि डॉ.सुशील चंद्र त्रिवेदी ने कहा भारतीय दर्शन मूलतः अध्यात्मवादी है ! यद्यपि यह भौतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण दोनों को समाहित करता है। अतिथियों का स्वागत वक्तव्य कुलसचिव बी.बी.ए.यू ,व कार्यक्रम सह- संरक्षक डॉ अश्विनी कुमार सिंह जी ने किया! सत्र के कार्यक्रम का धन्यवाद व आभार ज्ञापन सहायक निदेशक राजभाषा डॉ.बलजीत कुमार श्रीवास्तव जी द्वारा किया गया!
अकादमिक सत्र की अध्यक्षता प्रो. शर्वेश पाण्डेय (प्राचार्य, डी.एस.के., मऊ) ने की। इस सत्र में डॉ. शिवानी कटारा (लेखिका एवं समाजसेविका) तथा डॉ. विपिन झा (संस्कृत विभाग, बी.बी.ए.यू.) ने विचार व्यक्त किए।अध्यक्षता कर रहे प्रो. पाण्डेय ने सत्र विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा एक गहन और विस्तृत बौद्धिक परंपरा है, जिसमें जीवन-मृत्यु, ब्रह्मांड, सत्य और मानव अस्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है। भारतीय संस्कृति सदा से सामासिक एवं समन्वयवादी रही है। सामासिक संस्कृति का तात्पर्य केवल संस्कृतियों का योग नहीं बल्कि मिलकर एक हो जाने से है। डॉ शिवानी कटारिया ने कहा भारतीय संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल एक धार्मिक या दार्शनिक विचार भर नहीं है बल्कि यह एक नैतिक सिद्धांत है, जो हमें सभी प्राणियों के साथ आदरपूर्वक व्यवहार करने की प्रेरणा देता है। यह विचार किसी भी प्रकार की भौतिक सीमाओं को तोड़ता है और सभी जीवों को समान मानता है। दोनों वक्ताओं ने साहित्य में सांस्कृतिक मूल्यों की निरंतरता और संस्कृत-हिन्दी परंपरा की निकटता को रेखांकित किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. बाबूराम (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय, रोहतक) ने की। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. गिरीश चन्द्र मिश्र (उपाध्यक्ष, राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश) , मुख्य वक्ता के रूप में डॉ.सौरभ मालवीय (अध्यक्ष, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) व प्रो. आर.पी. गंगवार (अध्यक्ष,हिंदी विभाग,बी.बी.ए यू,लखनऊ) विशिष्ट वक्ता रहे। मुख्य वक्ता डॉ.सौरभ मालवीय जी ने कहा भारत का ज्ञानदर्शन वेद से आया क्योंकि उसने जीवन के दर्शन को बताया! हम कृतज्ञता व्यक्त करने वाले है हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति के बाद दूसरे के लक्ष्य में सहयोगी होते है ,यही भारत की परम्परा है और ये सभी जो सनातन है वो भारत है जो पुरातन है वो भारत है और जो परम्परगता है वो साहित्य है! वक्ताओं ने अपने व्याख्यानों में साहित्य और समाज के संबंधों, ज्ञान परंपरा की जीवंतता तथा आधुनिक युग में हिन्दी की भूमिका पर प्रकाश डाला।

संगोष्ठी में देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भागीदारी की। आयोजन को सफल बनाने में संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव(सहायक निदेशक राजभाषा/सहायक आचार्य, हिंदी विभाग बी.बी.ए.यू लखनऊ) व सह-संयोजक डॉ. शिवशंकर यादव (सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, बी.बी.ए.यू). का विशेष योगदान रहा।
संगोष्ठी समारोह सत्र का कुशल संचालन डॉ. शिव शंकर यादव (सहायक आचार्य हिंदीविभाग,बी.बी.ए.यू) व शशि प्रकाश पाठक द्वारा किया गया! इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिवार एवं उपस्थित जनों ने भारतीय ज्ञान परंपरा और हिन्दी साहित्य की समृद्ध धारा को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
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