लखनऊ . उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक ( शर्मा गुट ) के पदाधिकारियों ने भले ही सुरेश कुमार त्रिपाठी को प्रदेश अध्यक्ष के रूप में स्वीकार कर लिया हो लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुरेश त्रिपाठी शिक्षकों के बीच अपनी विश्वसनीयता को किस प्रकार प्रमाणित करेंगे.
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!यह सवाल केवल त्रिपाठी का ही नहीं बल्कि माध्यमिक शिक्षक संघ ( शर्मा गुट ) के उस अस्तित्व और विश्वास का है, जिसे ओमप्रकाश शर्मा और पंचानन राय जैसे नेताओं ने शिक्षकों के बीच पैदा किया था . इसी विश्वास का परिणाम रहा कि ओमप्रकाश शर्मा के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश विधान परिषद में माध्यमिक शिक्षक ( शर्मा गुट ) का वर्चस्व बना रहा और शिक्षकों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं का न केवल त्वरित समाधान हुआ बल्कि वेतन और सेवाओं से संबंधित भी कई बड़े फैसले शिक्षकों के हित में किए गए लेकिन ओम प्रकाश शर्मा के निधन के बाद स्थिति बिगड़ी और शिक्षक संगठन में लगातार गिरावट आई गई.
सबसे खराब स्थिति इस वर्ष 2026 में शिक्षक राजनीति में बनी जब माध्यमिक शिक्षक संघ ( शर्मा गुट ) के पदाधिकारियों के बीच ही अविश्वसनीयता की खाई पैदा हो गई . सुरेश त्रिपाठी के अध्यक्षीय कार्यकाल में संगठन में ऊपरी नेतृत्व के अंदर चल रही खींचतान का ही नतीजा रहा कि संगठन को वह मजबूती नहीं मिली जिसके लिए ओमप्रकाश शर्मा जाने जाते थे. इतना ही नहीं शिक्षक संघ के विभिन्न धरना प्रदर्शन कार्यक्रमों में भी यह भेद दिखाई पड़ा और सबसे खराब स्थिति उस समय हुई जब सुरेश त्रिपाठी ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्य करने से इनकार कर दिया और प्रमोद मिश्रा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया लेकिन फिर टिकट और राजनीति के चक्कर में प्रमोद मिश्रा , ध्रुव कुमार त्रिपाठी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर विधान परिषद के लिए शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से अपने-अपने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार बन गए .
माध्यमिक शिक्षक संघ ( शर्मा गुट ) की नेतृत्वहीनता का असर लगातार दिखाई दे रहा था लेकिन इस बीच पुनः सुरेश त्रिपाठी ने खुद को प्रदेश अध्यक्ष के रूप में बनाए रखने कवायद शुरू कर दी और अपने समर्थक पदाधिकारियों के बीच यह कहना शुरू कर दिया कि संगठन उनके नेतृत्व में ही आगे बढ़ाया जा सकता है . समर्थकों ने भी नेतृत्व किसी अन्य को मिले इसे देखते हुए सुरेश त्रिपाठी को ही बेहतर उपयुक्त समझा और कार्यकारिणी की बैठक में उन्हें ही अध्यक्ष मान लिया गया .
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि माध्यमिक शिक्षक संघ ( शर्मा गुट ) से जुड़े शिक्षकों को यह अच्छी प्रकार से पता है कि सुरेश त्रिपाठी किन परिस्थितियों में संगठन के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के राजी नहीं थे और वह कौन सी फिर ऐसी परिस्थितियों बनी कि वे पुन : इस पद को स्वीकार करने के लिए जोड़-तोड़ करने लगे और पद पा भी गए.
शिक्षकों के बीच शिक्षक नेता की विशेषता ईमानदारी और शुचिता , चरित्र ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन राजनीति का असर शिक्षक नेताओं में भी दिखाई पड़ने लगा है. यही कारण है कि शर्मा गुट की अंदरूनी राजनीति का शिकार हुए कई शिक्षक नेता अब सक्रियता के बजाय सामान्य रूप से ही संगठन के काम से जुड़े हुए हैं . ऐसे में सुरेश त्रिपाठी किस प्रकार से शिक्षकों के बीच अपने विश्वास और नेतृत्व को स्वीकार करा पाएंगे यह एक बड़ी चुनौती है .
वैसे भी प्रदेश की शिक्षक राजनीति में लगातार गिरावट आ रही है और न जाने कितने गुटों में विभक्त शिक्षक राजनीति शिक्षकों की समस्याओं से दूर व्यक्तिगत राजनीति की ओर केंद्रित होती जा रही है . ऐसा नहीं है कि आज शिक्षकों की समस्याएं नहीं है बल्कि ऐसा नेतृत्व ही नजर नहीं आ रहा है जो शिक्षकों की समस्याओं का समाधान कर सके. वेतन विसंगतियां, प्रमोशन, कार्यभार ग्रहण करने जैसी अनगिनत समस्या जिला विद्यालय निरीक्षक मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशकों के कार्यालय में लंबित हैं . सिटीजन चार्टर जैसी मांगों पर अमल करने के लिए शिक्षक परेशान हैं, लेकिन उन्हेंDIOS कार्यालय में चक्कर लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है . सामान्य से कार्यों के लिए उन्हें शिक्षा विभाग के उन बाबू की टेबल के सामने खाना खड़ा होना पड़ रहा है और उन्हें अपमानजन की स्थिति का सामना भी करना पड़ता है . ऐसे में शर्मा गुट के लिए ही चुनौती नहीं है बल्कि शिक्षकों के मान सम्मान को बनाए रखने के लिए नये सिरे से सोचने -समझने और रणनीतिक स्तर पर काम करने की जरूरत है . अब यह देखना है महत्वपूर्ण होगा कि सुरेश कुमार त्रिपाठी की यह पारी किस रूप में शिक्षकों के बीच विश्वास और भरोसा पैदा करती है ?
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