- -84 माह में सिर्फ 22 माह की रकम खाते में पहुंची, बाकी धनराशि और ब्याज की मांग
- -वित्त अधिकारी और कुलसचिव समेत संबंधित अधिकारियों से कई बार पत्राचार किया, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ
- -कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री से पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराने, धनराशि की जिम्मेदारी तय करने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के अभियांत्रिकी एवं तकनीकी संकाय के संविदा शिक्षक और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर उनके वेतन से काटी गई पीएफ की रकम खाते में जमा नहीं करने का गंभीर आरोप लगाया है। कर्मचारियों का दावा है कि करीब 84 माह से उनके वेतन से सीपीएफ/ईपीएफ की कटौती की जा रही है, लेकिन इसमें से केवल 22 माह की राशि ही उनके ईपीएफ खातों में जमा हुई है। मामले में कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री से शिकायत कर बकाया धनराशि ब्याज समेत खाते में जमा कराने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
कर्मचारियों के मुताबिक जुलाई 2019 से उनके वेतन से 10 प्रतिशत कर्मचारी अंशदान के रूप में सीपीएफ की कटौती शुरू हुई थी। मई 2022 में कुलसचिव की ओर से सीपीएफ के स्थान पर ईपीएफ से आच्छादित करने का आदेश जारी हुआ। इसके बाद अगस्त 2023 से 12 प्रतिशत की दर से ईपीएफ कटौती की जाने लगी। आरोप है कि वेतन से नियमित रूप से रकम काटी जाती रही, लेकिन ईपीएफ खाते में उसका नियमित अंशदान नहीं पहुंचा। कर्मचारियों ने कहा कि वे अल्प वेतन पाने वाले संविदा कर्मी हैं। उनके वेतन से भविष्य निधि के नाम पर नियमित कटौती के बावजूद खाते में रकम जमा न होना उनके भविष्य की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय तक मामले के निस्तारण में बरती गई लापरवाही से कर्मचारियों को आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक परेशानी भी झेलनी पड़ रही है। कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री से पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराने, धनराशि की जिम्मेदारी तय करने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
‘कटौती पर जवाब, जमा रकम पर चुप्पी’
कर्मचारियों का आरोप है कि उन्होंने विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी और कुलसचिव समेत संबंधित अधिकारियों से कई बार पत्राचार किया, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। ईपीएफओ में दर्ज शिकायत SRLKO/E/2026/01727 और मानवाधिकार आयोग की फाइल 20327/24/48/2025 का हवाला देते हुए कर्मचारियों ने कहा कि विश्वविद्यालय की ओर से जवाब में यह बताया गया कि ईपीएफ में 12 प्रतिशत अथवा अधिकतम 1800 रुपये की कटौती होनी चाहिए। कर्मचारियों का कहना है कि उनकी शिकायत यह नहीं है कि कितनी कटौती होनी चाहिए, बल्कि यह है कि वेतन से काटी गई रकम आखिर गई कहां? उनका आरोप है कि इस मूल सवाल का स्पष्ट जवाब देने के बजाय कटौती की सीमा को लेकर बात की जा रही है।
ब्याज समेत रकम जमा कराने की मांग
कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि जुलाई 2019 से अब तक वेतन से काटे गए सीपीएफ/ईपीएफ अंशदान की पूरी अवधि और राशि का स्वतंत्र रूप से सत्यापन कराया जाए। इसके साथ विश्वविद्यालय के नियोक्ता अंशदान तथा नियमानुसार देय ब्याज की गणना कर पूरी रकम उनके ईपीएफ खातों में जमा कराई जाए।
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