लखनऊ / चेन्नई , 20 मार्च , ऑल इंडिया यूनिवर्सिटीज द्वारा आयोजित 39वें इंटर-यूनिवर्सिटीज नेशनल यूथ फेस्टिवल 2025–26 का आयोजन 10 से 14 मार्च 2026 तक सत्यभामा इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, चेन्नई ( Sathyabama Institute of Science & Technology, Chennai ) में संपन्न हुआ। इस युवा महोत्सव में देश भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से चयनित प्रतिभागियों ने दृश्यकला की विभिन्न प्रतियोगिताओं—ऑन द स्पॉट पेंटिंग, कोलाज, पोस्टर मेकिंग, क्ले मॉडलिंग, कार्टूनिंग तथा रंगोली—में अपनी उत्कृष्ट रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
दृश्यकला प्रतियोगिताओं के लिए गठित तीन सदस्यीय निर्णायक मंडल में डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के डॉ. अवधेश मिश्र के साथ अल्मोड़ा के प्रो. शेखर जोशी तथा पुणे के अविनाश काटे शामिल थे। डॉ. अवधेश मिश्र की इस आयोजन में निर्णायक के रूप में नियुक्ति एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज, नई दिल्ली के जॉइंट सेक्रेटरी द्वारा की गई थी। राष्ट्रीय युवा महोत्सव विश्वविद्यालयीय छात्र जीवन का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है। इसमें भागीदारी तथा पुरस्कार के लिए चयनित होना विद्यार्थियों के लिए एक बड़ी उपलब्धि और संबंधित विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय होता है।
Sathyabama Institute of Science & Technology, Chennai News : इस अवसर पर विद्यार्थियों ने अपनी रचनात्मकता, कल्पनाशीलता और कलात्मक कौशल का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। डॉ. अवधेश मिश्र ने बताया कि प्रतियोगिताओं में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए प्रतिभागियों ने अपनी आंचलिक विशेषताओं और सांस्कृतिक विविधता को अभिव्यक्त करते हुए भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और रचनात्मक ऊर्जा को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया। प्रतिभागियों की कलाकृतियों का मूल्यांकन उनकी मौलिकता, अभिव्यक्ति, विषयवस्तु तथा तकनीकी दक्षता के आधार पर किया गया। विद्यार्थियों की रचनात्मक ऊर्जा भविष्य के प्रति आश्वस्त करने वाली रही।
युनिफेस्ट के समापन समारोह में चांसलर द्वारा सम्मानित डॉ अवधेश मिश्र ने संस्थान की चांसलर डॉ मारियाज़ीना जॉन्सन, चेयरमैन डॉ मैरी जॉन्सन और ऑल इंडिया यूनिवर्सिटीज के प्रतिनिधि डॉ शिवम् दीक्षित तथा आतिथ्य के लिए डॉ शमरीन अहमद, डॉ सुनीता सल्ला, डॉ रेखा और डॉ एंजेला को धन्यवाद दिया।
डॉ. अवधेश मिश्र लगभग तीन दशकों से भारतीय समकालीन कला में रचना और विचार दोनों स्तरों पर सक्रिय हैं। वे एक प्रख्यात कलाकार, कला समीक्षक, कलाचार्य तथा अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका ‘कला दीर्घा’ के संपादक के रूप में व्यापक रूप से पहचाने जाते हैं। उनकी कला का मूल स्रोत उनका ग्रामीण परिवेश है, जहाँ बचपन और किशोरावस्था के अनुभवों ने उनकी संवेदनात्मक और रचनात्मक चेतना को गहराई से प्रभावित किया। उनकी कृतियाँ केवल दृश्यात्मक अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विमर्श का सशक्त दृश्य-पाठ भी हैं।
डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व उनकी कला की ही भाँति संतुलित, अनुशासित और आत्मानुशासित है। मृदुभाषी, संवेदनशील और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा उनका व्यक्तित्व उन्हें एक साथ कलाकार, शिक्षक, समीक्षक और संपादक के रूप में विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। उनकी कला-यात्रा का प्रारंभ ग्रामीण परिवेश में मिट्टी, कोयले और गेरू से बने उन आरंभिक चित्रों से हुआ, जहाँ दीवारें और ज़मीन ही उनके पहले कैनवास थे। औपचारिक कला-शिक्षा के क्रम में उन्होंने कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट, लखनऊ से आर्ट मास्टर्स ट्रेनिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से बीएफए और एमएफए, रूहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली से पीएच.डी. तथा इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की है। तैल माध्यम में स्पैचुला, रोलर और विविध टेक्स्चर प्रयोगों के माध्यम से उन्होंने एक ऐसी भावप्रधान चित्र-भाषा विकसित की है जो आकारों की जकड़न से मुक्त होकर संवेदना और अनुभव की अभिव्यक्ति करती है।
लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों पर आधारित उनकी मोनोक्रोम श्रृंखला परंपरा और समकालीन संवेदना के नवाचारपूर्ण संयोजन का सशक्त उदाहरण है। डॉ. अवधेश मिश्र की पहचान का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष कला-समीक्षक और संपादक के रूप में उनका योगदान भी है। वर्ष 2000 से प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला पत्रिका ‘कला दीर्घा’ का संपादन तथा उनकी पुस्तकें—कला विमर्श, सम्वेदना और कला और पहला दस्तावेज़—भारतीय समकालीन कला जगत में महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। उनकी चर्चित ‘विजूका’ श्रृंखला भारतीय ग्रामीण जीवन के प्रतीक ‘पुतले’ को केंद्र में रखकर भय, सत्ता, व्यवस्था और नैतिक पतन जैसे बहुस्तरीय सामाजिक संकेतों को अभिव्यक्त करती है। इस श्रृंखला के चित्र देश-विदेश के अनेक शहरों—अयोध्या, भोपाल, लखनऊ, जयपुर, हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, पुणे, ठाणे, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, बुसान, अमृतसर, खजुराहो, मोहाली, धर्मशाला, बड़ौदा, भुवनेश्वर, चंडीगढ़, अहमदाबाद, पटना, लंदन, बर्मिंघम, दुबई, मस्कट, नागपुर, पटियाला और कोलकाता—में प्रदर्शित होकर व्यापक सराहना प्राप्त कर चुके हैं । अब तक डॉ. अवधेश मिश्र 19 एकल प्रदर्शनियाँ तथा सैकड़ों सामूहिक प्रदर्शनियों में भाग ले चुके हैं।

इसके अतिरिक्त ग्वालियर, अयोध्या, भद्रवाह, वाडा, जयपुर, भुवनेश्वर, शिलांग, ऋषिकेश, गुवाहाटी, धनौल्टी, अल्मोड़ा आदि स्थानों पर आयोजित अनेक राष्ट्रीय कला शिविरों में भी उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई है। उनकी चित्रकला के रंग मानो गाँव की मिट्टी से उठे हुए प्रतीत होते हैं—धूसर, हरा, नीला, पीला, लाल और गहरा स्याह। कागज़ की नाव, फिरकी, झंडियाँ, तख्ती, वर्णमाला, हल और चूल्हा जैसे प्रतीक उनकी कला में उधार लिए हुए नहीं, बल्कि जिए हुए जीवनानुभवों से उपजे हैं। तीन दशकों से अधिक की सतत सृजन-साधना के बावजूद उनकी रचनात्मक ऊर्जा अक्षुण्ण बनी हुई है। वे चित्रण, अध्यापन और लेखन-संपादन के माध्यम से भारतीय समकालीन कला को वैचारिक समृद्धि प्रदान करते हुए निरंतर सक्रिय हैं। राष्ट्रीय युवा महोत्सव का यह आयोजन विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करने तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए एक प्रभावी मंच प्रदान करने में सफल रहा।
