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अलकरहा नौकरी गुरुजी के..
बिहनिया ले उठ
बिना मुह धोये मोबाइल ल देख।
नहावा धोवा तहा थोड़ बहुत खावा।
टिफिन ल धरव, गाड़ी दबावा
हड़बड़ हड़बड़ दस बजे स्कूल म पहुचा।
पाठकान ल खोल दस्तकत करव।
मोबाइल निकालव फोटो खिचव
तहा झटपट ग्रुप म डालव
तेकर बाद गंगा नहाए कस
लगथेय।
मन के शांति बर पानी पिए ल पड़थेय।
तेकर बाद प्रार्थना अऊ हाजिरी ल लेवा
चाऊर नापा भात साग रधवावा
मोबाइल ल बीच बीच म देखा।
अर्जेंट जानकारी आगे तव पढ़ाई छोड़ डाक बनावा।
अलकरहा नौकरी गुरुजी के
छुट्टी के बाद भी मोबाइल देखत रहव।
तत्काल मंगाथेय तव, घरे म बैईठ बना के भेजव।
कई बिटोना हे हमर नौकरी म
तीन ठन सील दु जोड़ी चश्मा रखे ल पड़त हे
एक स्कूल म एक बेग म अऊ एक ठन घर म।
कोऊन बखत लग जाथेय कोई ठीकाना नई रहय।
अतको म हड़बड़ी म गड़बड़ी हो ही जाथेय।
कुछू न कुछू लगेच रईथेय अऊ खंगे रईथेय।
चाक खत्म तव कभु गोंद तव कभू फिलाईन तव कभू कागज।
ये सब बीच बीच म मोबाइल ल टमरत रव दस ठन ग्रुप खोजत रव।
लईकामन एदे गुरूजी हल्ला कराथेय एदे गुरूजी भागत हे
ये झमेला अलग आवत रईथेय।
एकर बाऊजुद गुणवत्ता के आशा हम करत हन।
आज कल एक हाथ म मोबाइल एक हाथ म चाक पकड़त हन।
लेकिन अपन ईमान अपन कर्तव्य के निर्वान्ह करत हन।
ग्यारह बजे रात तक मोबाइल
नई छोड़त हन।
कटुसत्य मोर रचना
ओमप्रकाश वर्मा, बिलासपुर छत्तीसगढ़
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