
यह कविता एक संवेदनशील शिक्षक ओमप्रकाश वर्मा जी
ने भेजी है . वे अपने संकुल के शैक्षिक समन्यवक हैं और सामाजिक कार्यक्रमों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं .
पढ़िए कविता
सुरता आथे संगी जवरिहा
सुरता आथे संगी जवरिहा
डंडा पचरंगा, सातुल के खेल
रेसटिप कबड्डी ,भवरा के खेल
खचवा डबरा के मछरी पकड़ाई।
संगी जवरिहा संग भुंज के खाईं
तरिया के पार बैईठ गरी ल खेलन।
पीपरी अऊ कुकरी कांदा ल खावन।
ठाड़े मंझनिया के घाम आमा बगीचा म जान।
संगी जहुरिया संग बैईठ आमा ल चिचोरन।
आमा के चटनी,बोरे बासी के संग।
अड़बड़ मिठावय नुन मिरचा के संग।
गौटिया के घर म एक ठन साईकिल
देख के संगी मन,मन ल मारय
गाड़ी बैला म बैईठ के, छुक छुक गाड़ी चवलावन।
संगी जहुरिया के कपड़ा उधारी।
जावन पहिन के गांव गवतरी।
संगी जवरिहा के सुरता ह आथे।
एक माई के लईका कस पढ़न लिखन
सुख दुख के हर पीरा ल
मिल बाट हरन।
ओ दिन आऊ आज सोचके
बड़ रोवासी आथे।
का दिन अब आगे संगी
अब अपने ह रोवाथे।
कोन अपन कोन पराय ये समझ नई आत हे।
अपने अपन कटत मरत हे
पी खाके इतरात हे।
रिश्ता नाता अब दुर भागत हे
पड़ोसी ह मुह लुकात हे।
एक दुसर बर जुड़वत नई हे
मरे मारे बर जोगत रईथेय।
भरोसा सब टुटत जावत हे
संगी जवरिहा के अब बात नई हे।
भरोसा घटत जावत हे।
हम दो हमारे दो अतके म
भुलावत हे
दाई ददा के चिन्हारी नई हे
कका ददा के बलिहारी हे।
अपने देख जुड़ाय नहीं
अईसे अब के कहानी हे।
ओमप्रकाश वर्मा
सेमरताल
बिलासपुर छत्तीसगढ़
