लखनऊ : नवयुग कन्या महाविद्यालय, लखनऊ (Navyug Kanya Mahavidyalaya, Lucknow) के हिन्दी विभाग की संस्था ‘नवज्योतिका’ के तत्वावधान में ‘हिन्दी दिवस’ के पावन उपलक्ष्य में “हिन्दी साहित्य में मानवीय एवं नैतिक मूल्य” विषयक राष्ट्रीय वेबिनार का गरिमामय आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस ज्ञानसंवर्धक संगोष्ठी की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्या एवं संरक्षिका प्रो० मंजुला उपाध्याय ने की।
वेबिनार के मुख्य वक्ता लखनऊ विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो० योगेंद्र प्रताप सिंह ने अपने विद्वत्तापूर्ण संबोधन में विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा भी इस दिशा में विशेष शोध कार्यक्रम एवं अभियान चलाए जा रहे हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज का मानव भौतिक प्रगति की अंधी होड़ में अपने नैतिक मूल्यों को भूलता जा रहा है, और ऐसे समय में साहित्य ही उसे पुनः सही दिशा प्रदान कर सकता है। उन्होंने जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक ‘चंद्रगुप्त’ में दांड्यायन ऋषि के प्रसंग का उल्लेख करते हुए मानवता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने इसे ‘आत्म-तृप्त’ और ‘जलवत् ग्रहणशील’ बताया, जो अपनी मूल पहचान को अक्षुण्ण रखते हुए भी अन्य संस्कृतियों को सहर्ष आत्मसात कर लेती है।
प्रो० सिंह ने आगे कहा कि साहित्य सदैव धर्मशास्त्र और नीति दर्शन का आलंबन लेकर मानव कल्याण को प्रेरित करता है। आचार्य भामह का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट काव्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और कलाओं में निपुणता के साथ-साथ यश और आनंद प्रदान करता है। ‘कला कला के लिए’ के सिद्धांत के स्थान पर ‘कला जीवन के लिए’ की अवधारणा को स्थापित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि कला का सर्वोच्च मूल्य स्वयं मनुष्य है। पाश्चात्य विचारक क्रोंचे जहाँ बाह्य सौंदर्य पर बल देते हैं, वहीं आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य में ‘लोक-मंगल’ को सर्वोपरि माना।
नीतिशास्त्र के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने मानक नीतिशास्त्र, परिणामवाद, अधिनीतिशास्त्र और कर्तव्यशास्त्र के अंतर को समझाया और कहा कि फल की चिंता किए बिना केवल कर्तव्य-पालन ही प्राथमिक नैतिकता है। उन्होंने रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा हिन्दी साहित्य के आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल की तुलना भर्तृहरी के तीन शतकों से किए जाने का उल्लेख किया तथा निष्काम भाव को मानव धर्म की आधारशिला बताया। भगवान महावीर की अहिंसा, महात्मा बुद्ध की करुणा, स्वामी दयानंद की सेवा और स्वामी विवेकानंद के ‘दरिद्र नारायण’ के सेवा-भाव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों के दुख को समझना ही मानवता की असली कसौटी है। आज के तकनीकी और भौतिकवादी दौर में साहित्य ही मनुष्य के भीतर की संवेदनशीलता और सहानुभूति को जीवित रखता है, जिसकी ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना वैश्विक शांति के लिए अत्यंत आवश्यक है।
वेबिनार की विशिष्ट वक्ता आई. टी. डिग्री कॉलेज, लखनऊ की प्रो० नीतू शर्मा ने अपने सारगर्भित संबोधन में कहा कि साहित्य की उत्पत्ति करुणा से होती है, जो मानवीयता का मूल आधार है। आदिकवि वाल्मीकि के करुणा से परिपूर्ण हृदय द्वारा ही साहित्य का सृजन आरंभ हुआ था। ‘साहित्यस्य भाव साहित्यम्’ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि अहिंसा और न्याय से परिपूर्ण शब्द ही वास्तविक साहित्य हैं। आचार्य मम्मट के ‘काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये’ सूत्र के माध्यम से उन्होंने काव्य के प्रयोजनों को रेखांकित किया।
Navyug Kanya Mahavidyalaya, Lucknow : प्रो० शर्मा ने कहा कि ‘अयं निजः परो वेति’ की संकीर्ण भावना से ऊपर उठकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार ही साहित्य का मूल है। साहित्य हमें सत्य और असत्य में भेद करना सिखाता है और धर्म के दस लक्षण ही साहित्य के वास्तविक आधार हैं। संत तुलसीदास जी की पंक्तियों “कीरति भनिति भूति भलि होई, सुरसरि सम सब कह हित होई” का उद्धरण देते हुए उन्होंने बताया कि उत्कृष्ट साहित्य सदैव सर्वकल्याण पर आधारित होता है।

उन्होंने महाभारत से आचरण की शिक्षा, श्रीमद्भगवद्गीता से धर्म और विजय के संबंध तथा पंचतंत्र एवं हितोपदेश जैसे ग्रंथों से नैतिक शिक्षा का उल्लेख किया। भक्तिकालीन कवियों द्वारा सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार और मुंशी प्रेमचंद द्वारा उपन्यासों में आदर्शवाद व नैतिकता की पुनस्थापना को रेखांकित किया। काव्य जगत में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, बलभद्र शर्मा, हरिवंश राय बच्चन और सोहनलाल द्विवेदी की रचनाओं का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि साहित्य सदैव संघर्ष और कर्तव्य पथ पर डटे रहने की प्रेरणा देता है। अंत में उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर, आर. के. नारायण, मुल्कराज आनंद और विक्टर ह्यूगो जैसे वैश्विक साहित्यकारों का उल्लेख करते हुए निष्कर्ष निकाला कि साहित्य के तीन प्रमुख लक्ष्य हैं— संवेदना का विस्तार, सहानुभूति से स्वानुभूति तक का मार्ग प्रशस्त करना और युवा पीढ़ी का सम्यक् मार्गदर्शन करना।

प्राचार्या प्रो० मंजुला उपाध्याय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिन्दी साहित्य में निहित मानवीय एवं नैतिक मूल्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो युवाओं के चरित्र निर्माण, संवेदनशीलता और सर्वांगीण विकास में महती भूमिका निभाते हैं। आज के डिजिटल युग में छात्राओं को इन उच्च आदर्शों को अपने दैनिक आचरण में आत्मसात कर एक सशक्त, संवेदनशील एवं न्यायप्रिय समाज के निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ० मेघना यादव ने किया। वेबिनार के कुशल संयोजन एवं व्यवस्थापन में हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ० अंकिता पाण्डेय एवं डॉ० अपूर्वा अवस्थी का सराहनीय योगदान रहा। इस अवसर पर प्रो० संगीता कोतवाल, प्रो सीमा सरकार,प्रो विनीता सिंह,प्रो वंदना द्विवेदी,प्रो० आभा पाल, डॉ० सुनीता सिंह, डॉ० नेहा अग्रवाल, डॉ० आभा दुबे, श्रीमती नीलम सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं महाविद्यालय (Navyug Kanya Mahavidyalaya, Lucknow) के सभी संकायों की छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर कार्यक्रम को सफलता प्रदान की।
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