लखनऊ . लखनऊ विश्वविद्यालय वर्तमान समय में कई अंदरूनी समस्याओं से जूझ रहा है . छात्रावासों में भोजन की गुणवत्ता को लेकर छात्राएं प्रदर्शन तक कर चुकी हैं , व्यवस्था न सुधरने पर अभी भी विरोध जता रही हैं और छात्र भी फीस वृद्धि, छात्रावासों की व्यवस्था को लेकर आए दिन कुलपति कार्यालय पर विरोध कर रहे हैं . पढ़ाई और प्रवेश से जुड़ी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं .
इन सब समस्याओं के बावजूद लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन का ध्यान सिर्फ कर्मचारी परिषद की वैधता पर टिका है . कर्मचारी परिषद वैध है या नहीं ? इसको लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब दूसरा आदेश जारी किया है . पहले जारी किए गए आदेश में भी कर्मचारी परिषद के कार्यकाल को समाप्त घोषित किया गया था और कर्मचारी परिषद के पुनः चुनाव के लिए चुनाव अधिकारी भी नामित किया गया था . कानूनी दावं पेंच के बीच विश्वविद्यालय को पुनः एक बार फिर आदेश निकलना पड़ा.विश्वविद्यालय प्रशासन की मंशा विश्वविद्यालय कर्मचारी परिषद की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का हनन करना है विश्वविद्यालय कर्मचारी परिषद एक संगठन है और विश्वविद्यालय प्रशासन व शासन द्वारा निहित श्रम कानून के अंतर्गत ही कर्मचारियों के हितों की बात लोकतांत्रिक तरीके से रखने का एक सशक्त माध्यम है. अगर कार्यकाल एक साल का होता है और प्रशासन को मालूम है तो अब तक ये रहस्यमयी चुप्पी क्यों थी ? जाहिर सी बात है कि निशाना कहीं और है ? लेकिन निशाने पर अब खुद प्रशासन आ गया है .
यह पहली बार नहीं है जब विश्वविद्यालय कर्मचारी परिषद का कार्यकाल 1 साल से अधिक हो गया हो , इसके पूर्व में भी कई ऐसे उदाहरण है जब कर्मचारी परिषद के पदाधिकारियों ने एक वर्ष से अधिक समय तक न केवल पदाधिकारी के रूप में कार्य किया बल्कि चुनाव कराने में भी तरह-तरह की बाधाएं पैदा की , लेकिन विश्वविद्यालय के हालिया फैसले से साफ है कि उसका ध्यान विश्वविद्यालय के हितों जैसे पढ़ाई , छात्रावासों की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना खाना की गुणवत्ता , शिक्षकों की समस्याएं दूर करने में नहीं है बल्कि उसका पूरा ध्यान विश्वविद्यालय कर्मचारी परिषद की वैधता पर है .
महत्वपूर्ण बात यह है कि लखनऊ विश्वविद्यालय की यह एक ऐसी सोच है जो ना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को हनन करने वाली है बल्कि भविष्य में इसके दुष्परिणाम भी सामने आने आना तय माना जा रहा है . आखिर विश्वविद्यालय प्रशासन को यह जवाब तलाशना चाहिए कि कर्मचारी परिषद के चुनाव कराने के लिए नामित अधिकारी ने अब तक कितना कार्य किया है और क्यों विलंब किया जा रहा है ? जाहिर सी बात है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उन आवाजों को पूरी तरीके से दवा देना चाहता है जिसे जिन्हें अपनी बात कहने का अधिकार मिला हुआ है. अब यह देखना है महत्वपूर्ण होगा कि लखनऊ विश्वविद्यालय प्रशासन कर्मचारियों से जुड़ी समस्याओं के निदान के लिए किस प्रकार का फैसला करता है या छात्र संघ चुनाव की तरह टालते रहने का एक रिकार्ड बनेगा ?
