इंडी गठबंधन की नई दिल्ली में रविवार को आयोजित रैली में उठाये गए मुद्दे कोई नए नहीं है | लोकसभा चुनाव 2024 के संपन्न होने के लगभग डेढ़ साल बाद या यूं कहें कि लगातार चुनाव हारने के बाद कांग्रेस ने कथित वोट चोरी का एक मुद्दा उठाया और तर्क दिया कि वोट चोरी किए जाने से विपक्ष चुनाव हार रहा है | नई दिल्ली में इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस नेताओं ने अपने सभी सहयोगी दलों को भी इस रैली में आमंत्रित किया था हालांकि विपक्ष में शामिल कई बड़े नेता इस रैली में नहीं दिखे और ना ही उन्होंने इस रैली को समर्थन दिया | सबसे बड़ी बात यह है कि ये चुनाव आयोग से जुडा मुद्दा माननीय न्यायालय में विचारार्थ है |
हम इस रैली में उठाए गए मुद्दों की वैधानिकता और उसके वर्तमान स्वरूप के तार्किक और अतार्किक धाराओं में नहीं बांट रहे हैं बल्कि हमारी चिंता इस रैली में वक्ताओं के भाषण में बोले गए शब्द और विरोध की आड़ में लोकतांत्रिक संस्थाओं व्यक्तियों और इन संस्थाओं के पदाधिकारियों पर किए गए व्यक्तिगत हमले हैं | पूरे देश ने देखा कि किस तरह से इस रैली में वक्ताओं ने खास तौर पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए जिस तरीके से मर्यादा लांघकर शब्दों का प्रयोग किया | वह न केवल राजनीतिक मर्यादा बनाये रखने चिंता नहीं है बल्कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने गए प्रधानमंत्री पर सीधा व्यक्तिगत हमला है | उनके बारे में कही गई बातें किसी भी सूरत में उपयुक्त नहीं ठहरायी जा सकती हैं और ना ही किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष के किसी नेता द्वारा ऐसा कहा ही जाना चाहिए |
प्रधानमंत्री के साथ-साथ उन्होंने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के प्रति भी संबोधन में न केवल तल्खी दिखाई बल्कि उनके लिए भी ऐसे ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जिन्हें संसदीय श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है | उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को जेल भेजने जैसे शब्दों का भी उपयोग किया जबकि प्रधानमंत्री के लिए भागने नहीं दिया जाएगा जैसे शब्दों को कहकर व्यवस्थागत चीजों को एक नए अराजकवादी स्थिति में पहुंचाने की कोशिश करते दिखाई पड़े | इस रैली में विपक्ष की ही एक और नेता पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी रैली में मुख्य मुद्दों पर चर्चा करने की बजाय उन्होंने एक कविता के माध्यम से जिन बातों को रखने की कोशिश की वह असफल साबित हुई | एक बड़े राज्य की लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस तरह उन्होंने दिल्ली में रैली के मंच पर अपनी वक्तव्य शैली दिखाई वह भी संयमित और मर्यादित नहीं दिखी |
लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमत होना , सत्तारूढ़ दल की नीतियों-कृत्यों का विरोध करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में धरना प्रदर्शन ज्ञापन, रैली जैसे अनेकानेक मार्ग हैं और यह व्यवस्था आजादी के बाद से देश में चली आ रही है | हां इतना जरूर है कि गाहे- बागाहे हर राजनीतिक दल ने अपने-अपने स्तर से इस व्यवस्था को कुंद करने की कोशिश की है | इस देश में सबसे अधिक समय तक राज्य करने वाली कांग्रेस ने कुछ ज्यादा ही किया है, लेकिन इस समय यह पुरानी बातें दोहराने की बजाय कांग्रेस की रैली में देखना महत्वपूर्ण होगा कि नेताओं द्वारा दिए गए भाषण, उनके संकेत और आह्वान को देश की जनता किस रूप में ग्रहण करती है ? हालांकि इन शब्दों – विशेषणों पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तत्काल नाराजगी भी जताई लेकिन भाजपा एक राजनीतिक दल के रूप में विरोध कर सकती है और वह अपने नेता का बचाव कर सकते हैं और कर ही रहे हैं |
असली बात किसी एक नेता के सिर्फ मान की नहीं है, अपितु देश के प्रधानमंत्री, देश के गृहमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त के सम्मान और मर्यादा की है| इसलिए देखना बहुत महत्वपूर्ण होगा कि अब इंडी गठबंधन का अगला कदम क्या होगा ? ऐसी भड़काऊ और घृणा फैलाने वाली बातें क्या भविष्य में भी जारी रहेगी ? सवाल यह भी है कि क्या देश की सक्षम संस्थाएं ऐसे आयोजनों , ऐसे भाषणों और ऐसे वक्तव्य पर किसी कानूनी दायरे में कार्रवाई करेंगी या फिर राजनीति के गिरते स्तर का यह अभी न्यूनतम दौर नहीं है | आने वाले दिनों में दौर में राजनीति और गिरेगी और गिरेगी गिरता ही जाएगा|
