दुर्ग- भिलाई . हर कलाकार की दिली ख्वाहिश होती है कि जीवन व सृष्टि के विभिन्न आयामों को नये नये रूप में कलाकृत करने के साथ ही उस क्षेत्र में भी कुछ कर दिखाये जिसमे समाज के बहुसंख्यक वर्ग की आस्था जुड़ी है। यही कारण है कि हमे कलाकार की कृतियों में नवीनता एवं अनुठापन देखने को मिलता रहता है। अब तक हमने नारियल, सिक्के गौली धागे, मेवे, मोम इत्यादि से निर्मित गणेश जी के दर्शन किये हैं।

नवीनता के इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये “बिना जोड़ मुवमेंट तकनीक के माहिर एवं राज्य स्तरीय सिद्धहस्त शिल्पी पुरस्कार से सम्मानित काष्ठ शिल्पी” भिलाई छत्तीसगढ़ निवासी श्रवण चोपकर जी ने लकड़ी के एक ही टुकड़े को महज तराशकर हिन्दू धर्म के अधिष्ठाता देव गणेशजी के प्रति आस्था को रूपाकार कर बेजोड़ शिल्प की रचना की है। शिल्प कृति ‘श्री गणेश कला कौशल में तकनीक तथा कल्पना शीलता के अदभूत पयूजन की अनूठी मिसाल है। जोड़ रहित कृति के कुछ भाग जैसे चैन एवं लॉकेट को दाएं-बाए ऊपर-नीचे, हिलाया एवं डुलाया जा सकता है.

एक माह के अथक परिश्रम से निर्मित यह आलस्था शिल्प पारंपरिक और मॉर्डन आर्ट के अद्भुत संगम की अनुठी मिसाल है। कृति इतनी चित्ताकर्षक है कि ईश्वर में विश्वास न करने वालों (नास्तिक) के मन में भी श्रद्धा के दीप प्रज्जवलित हो उठे। गले में लंबी बिना जोड़ की खुबसूरत चैन एवं लॉकेट तथा गुंड में सुशोभित जलकलश एवं नारियल को देखकर महसूस होता है मानों सजधजकर श्री गणेश, भगवान शंकर जी की पूजा कर रहे हो। लॉकेट में सामने की और पवित्र अक्षर ऊं तथा पीछे की की ओर पवित्र सुदर्शन चक्र बेहद खुबसूरती से कटिंग द्वारा बनाया गया है। कृति को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए गजानन के चौड़े माथे पर शीशम लकड़ी का तिलक एवं दो नेत्र बहुत सफाई के साथ लगाए गए हैं।

