- धरती की सोंधी खुशबू, पसीने की महक, और ढोल की गूँज
मलिहाबाद . जब भादों का महीना अपनी उमस और हरियाली लिए ढलान पर होता है, जब खेतों में धान की बालियाँ झुकने लगती हैं और आकाश में बादल विदाई का राग गाते हैं — तब मलिहाबाद के आँचल में बसे सैफलपुर और ढेढ़ेमऊ के बीच एक अद्भुत हलचल मचती है। भादों दशमी आती है — और उसके साथ आता है वह दंगल मेला, जो पीढ़ियों से इस मिट्टी की साँसों में घुला हुआ है।
मिट्टी का उत्सव, लहू का जोश
यह कोई साधारण मेला नहीं। यह उस गाँव की आत्मा की पुकार है जो साल भर खेत-खलिहान में झुकी रहती है, लेकिन भादों दशमी को सीधी खड़ी होकर कहती है — “हम भी हैं, हमारी भी एक दुनिया है।”
सुबह की पहली किरण के साथ ही गाँव-गाँव से लोग उमड़ने लगते हैं। बुजुर्ग अपनी छड़ी थामे, जवान अपनी बाँहों में ताज़गी भरे, बच्चे कन्धों पर चढ़कर रास्ता नापते हुए। औरतें रंगीन साड़ियों में, माथे पर घूँघट और आँखों में उत्सुकता लिए चली आती हैं। मेले की दिशा में जाने वाली हर पगडंडी उस दिन एक नदी बन जाती है — लोगों की, उमंगों की, परम्पराओं की।
अखाड़े की वह पवित्र मिट्टी
दंगल का अखाड़ा — वह कोई मैदान भर नहीं होता। वह एक तीर्थ होता है।
पहलवान जब उस मिट्टी को माथे से लगाते हैं, तो लगता है जैसे कोई योद्धा अपनी माँ के पाँव छू रहा हो। उस मिट्टी में उनके बाप-दादाओं का पसीना मिला है, उनके उस्तादों की दुआएँ मिली हैं। गाँव के नौजवान जब अखाड़े में उतरते हैं तो उनके कन्धों पर सिर्फ अपनी नहीं, पूरे गाँव की इज़्ज़त होती है।
ढोल का पहला नगाड़ा बजता है — और माहौल बदल जाता है। हवा में एक अजीब सी सिहरन दौड़ जाती है। भीड़ साँस रोक लेती है। दो पहलवान एक-दूसरे के सामने खड़े होते हैं — एक भूमि, एक आकाश — और फिर शुरू होती है वह कशमकश जो शरीर की नहीं, जिगर की होती है।
मेले का वह रंग जो कहीं और नहीं मिलता
दंगल के अलावा भी मेले में जीवन का पूरा रंग बिखरा होता है।
एक तरफ मिठाई की दुकानें — जलेबी की कड़ाही में उठता भाप, बालूशाही की मिठास, खिलौनों पर मचलते बच्चे। दूसरी तरफ लोहे के औज़ार, चमकती चूड़ियाँ, गुड़ की भेली। बीच-बीच में चाय की चुस्की लेते बुज़ुर्ग जो पुराने दंगलों के किस्से सुनाते हैं — “अरे वो जब रमज़ानी पहलवान ने फलाने को चित किया था…” — और किस्सा सुनने वाले जैसे उसी पल में जी उठते हैं।
यह मेला एक पुल है — पुराने और नए के बीच, गाँव और परम्परा के बीच, एक पीढ़ी और अगली पीढ़ी के बीच।
भादों दशमी — क्यों इसी दिन?
भादों दशमी का अपना एक संयोग है। खरीफ की फसल लहलहा रही होती है, किसान के हाथ थोड़े खाली होते हैं, मन में एक तृप्ति होती है। यह वह दिन है जब धरती अपनी मेहनत का फल देती नज़र आती है। तो किसान भी उत्सव मनाता है — अपनी देह की ताकत का, अपनी मिट्टी की ताकत का।
दशमी यानी दस — और दस दिशाओं में फैली उस मेले की धमक आज भी दूर-दूर के गाँवों तक पहुँचती है।
जो खो रहा है, उसे थामना होगा
आज जब गाँवों से शहर की तरफ पलायन बढ़ रहा है, जब मोबाइल की स्क्रीन ने चौपालों की जगह ली है — तब इस तरह के मेले और भी ज़रूरी हो जाते हैं।
यह दंगल मेला सिर्फ पहलवानी नहीं सिखाता — यह जड़ों से जुड़ना सिखाता है। यह कहता है कि तुम्हारी पहचान किसी शहर के मॉल में नहीं, इस अखाड़े की मिट्टी में है। तुम्हारी विरासत उस ढोल की थाप में है जो तुम्हारे दादा के ज़माने से बज रही है।
मालिहाबाद, सैफलपुर, ढेढ़ेमऊ के इस दंगल मेले को सहेजिए। आने वाली पीढ़ियों को इसकी कहानी सुनाइए। बच्चों को साथ लेकर जाइए ताकि उनके मन में भी यह मेला एक याद बन जाए — एक ऐसी याद जो उन्हें जीवन भर अपनी जड़ों से बाँधे रखे।
क्योंकि जो कौम अपनी परम्पराओं को भूल जाती है, वो अपना आपा खो बैठती है।
और भादों दशमी की यह मिट्टी — यह आपा कभी नहीं भूलने देती।
— एक गाँव का बेटा, जिसके कानों में आज भी उस अखाड़े का ढोल बजता है।
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