लखनऊ . लखनऊ से कुछ ही कोस दूर, जहाँ सड़कें हरे-भरे बागों के बीच से गुज़रती हैं, वहाँ बसा है मलिहाबाद — एक ऐसी जगह जहाँ हवा में मिठास घुली होती है और धरती सोना उगलती है। यह सोना कोई साधारण धातु नहीं, बल्कि आम का वह पीला, रसीला, सुगंधित फल है जिसने इस छोटे से कस्बे को पूरी दुनिया में अमर कर दिया।
आमों का साम्राज्य
मलिहाबाद को “आमों की राजधानी” यूँ ही नहीं कहा जाता। यहाँ के बागों में हज़ारों एकड़ में फैले आम के पेड़ हैं, और इनसे निकलती हैं वो किस्में जो दुनिया के किसी और कोने में नहीं मिलतीं। दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फ़जली — हर नाम अपने आप में एक कहानी है, एक स्वाद है, एक यादगार बचपन की गर्मी है।
लेकिन इन सबमें दशहरी आम का एक अलग ही मुकाम है। कहते हैं कि दशहरी गाँव का वह पुराना पेड़, जो अब भी खड़ा है, इस किस्म का जनक है। सैकड़ों साल पुराना वह पेड़ आज भी फल देता है — जैसे बुज़ुर्ग दादा-दादी अपनी पुरानी कहानियाँ सुनाते रहते हैं।
पद्म श्री कलीमुल्लाह खान — एक बागबाँ की अद्भुत कला
मलिहाबाद की पहचान सिर्फ दशहरी से नहीं, बल्कि यहाँ के उस जादूगर बागबाँ कलीमुल्लाह खान से भी है, जिन्होंने एक ही पेड़ पर 300 से अधिक किस्मों के आम उगा दिए। उनकी यह करामात दुनिया भर के अखबारों में छपी, और उन्हें पद्म श्री से भी नवाज़ा गया। उनका वह “मल्टी-ग्राफ्टेड” पेड़ मलिहाबाद की आत्मा का प्रतीक है — विविधता में एकता, एक डाल पर अनेक रंग।
बागों की खुशबू, यादों की बारात
जून की तपती दोपहर में जब आप मलिहाबाद के बागों से गुज़रते हैं, तो एक अजीब-सी ठंडक मिलती है। घने पेड़ों की छाँव में, कच्चे आमों की खटास और पके आमों की मिठास एक साथ हवा में तैरती है। बाग़ों में काम करने वाले किसान, जिनके हाथ मेहनत से काले पड़ गए हैं, आपको प्यार से एक आम थमा देते हैं — और उस एक आम में पूरा मलिहाबाद समा जाता है।
यहाँ का आम महोत्सव हर साल एक मेले की तरह होता है। दूर-दूर से लोग आते हैं, आमों की प्रदर्शनी देखते हैं, नई किस्मों को चखते हैं, और मलिहाबाद की मिट्टी का शुक्रिया अदा करते हैं।
मिट्टी का रिश्ता, पीढ़ियों की विरासत
मलिहाबाद सिर्फ एक जगह नहीं, एक विरासत है। यहाँ के किसानों की तीसरी-चौथी पीढ़ी उन्हीं बागों में काम करती है जो उनके पुरखों ने लगाए थे। हर पेड़ के साथ एक परिवार की यादें जुड़ी हैं, हर फसल के साथ एक उम्मीद।
आज जब शहरीकरण की आँधी सब कुछ बदल रही है, मलिहाबाद के बाग़ अपनी ज़मीन पर खड़े हैं — हरे, घने, फलदार। जैसे कह रहे हों: “हम यहाँ थे, हम यहाँ हैं, हम यहाँ रहेंगे।”
अंत में…
मलिहाबाद जाना सिर्फ एक यात्रा नहीं है — यह एक अनुभव है। जहाँ हर आम एक कहानी सुनाता है, हर बाग एक कविता है, और हर किसान एक फ़नकार। अगर कभी मौका मिले, तो इस जन्नत में ज़रूर जाइए — और एक पका हुआ दशहरी आम खाकर देखिए। उस एक पल में आपको समझ आ जाएगा कि मलिहाबाद को आमों की जन्नत क्यों कहते हैं।
“जिसने मलिहाबाद का आम खाया, उसने दुनिया की मिठास चख ली।”
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