रायपुर . सावन विशेष “सावन का झूला” श्रावण मास अर्थात सावन के महीने मे झूला झूलने का आनंद ही कुछ और होता है। हरियाली त्यौहार मनाती महिलायें जब वृक्ष की मजबूत डाल पर बने झूले में बैठकर हौले-हौले झूलते हुए रिम झिम बारिश का आनंद लेती है, तो नजारा देखते ही बनता है। लबालब बहती नदियों मे नाव की सैर करते हुए पल पल रूप बदलते मेघाच्छादित आकाश का अवलोकन मन को असीम शाति एंव खुशियो से भर देता है।
श्रावण मास में शिव उपासना का अपना अलग ही महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि हर सोमवार शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से हर मनोकामना पूरी होती है। नागपंचमी के दिन विशेष रूप से नाग देवता की पुजा अर्चना की जाती है।
इन्ही सब बातों से प्रेरित होकर राज्य स्तरीय सिद्धस्त शिल्पी पुरस्कार से सम्मानित काष्ठ शिल्पी श्रवण चोपकर ने लकड़ी के सिंगल पीस ब्लॉक (चार फीट ऊंचे, सवा फीट चौड़े एवं आधे फीट मोटे) को तीन महीने के अथक परिश्रम से वृक्ष की डाल पर बने झूले एंव चैन से लंगर डाले नाव की शक्ल देकर श्रावण मास की उपरोक्त अनूभूति का सजीव चित्रण किया है। कलाकृति के सबसे ऊपर वाला भाग विशाल वृक्ष है जिसमें दृश्यमान छेद पक्षियों के घोंसले है। वृक्ष की मज़बूत डाल पर झूला है। झुले के सबसे निचले भाग को भाग्यशाली होने के प्रतीक कुछए का रुप दिया गया है। सबसे नीचे दांए किनारे पर शिव मंदिर है जिसमें शिव लिंग दृश्यमान है। मंदिर के ठीक ऊपर नाग देवता शेष नाग विराजमान हैं। इस प्रकार यह कलाकृति सावन माह के सभी उत्सव की एक संपूर्ण झांकी प्रस्तुत करती है।
कृति में कहीं भी किसी भी प्रकार का जोड़ (Joint) न होने के बावजूद इसके भाग विशेष का हिल-डुल सकना चोपकरजी के कलाकृतियों की मूलभुत विशेषता है।लकड़ी के एक टुकड़े मात्र को बिना काटे जोड़े महज तराशकर (Carving) संदेश देती अथवा भाव प्रदर्शित करती फोल्ड हो सकने वाली कृति में तब्दील कर दिया जाता है। निर्माण के दौरान मुल लकड़ी का कोई भी भाग काटकर अलग नहीं किया जाता है। अतः कृति में कहीं भी किसी भी प्रकार का जोड़ नहीं आता जैसा कि हम सामान्यतः सोफे अथवा कुर्सी के हत्थों या पायों में देखते हैं। नाना आकार – प्रकार के विशिष्ट सुक्ष्म यंत्रों से कुरेद-कुरेदकर मुख्य लकड़ी के अनावश्यक भाग को अलग कर दिया जाता है और शेष रह जाती है हिल-डुल सकने योग्य अवयवों वाली जोड़रहित (Jointless) शिल्पकृति। अर्थात कृति में मुवमेंट के लिए आवश्यक क्लियरेंस (गेप, Gape) तराशने की खास तकनीक द्वारा उत्पन्न किया जाता है न कि अलग-अलग भागों को एकत्र (Assemble) कर। यही तकनीकी विशेषता इन्हें एक सामान्य बढ़ई से अलग एक अद्भुत – अपुर्व शिल्पकार की श्रेणी में ला खड़ा करती है।
श्री चोपकर ने campussamachar.com को बताया कि उनके द्वारा निर्मित प्रत्येक कृति वास्तव में कला एवं तकनीक का अद्भुत संगम होती है जिसे देखकर कला में किसी भी प्रकार कि रूचि न रखने वालों में भी कला के प्रति चाहत पैदा होते देर नहीं लगती। लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस एवं इण्डिया बुक ऑफ रिकार्डस ने भी इनकी विशेषता “बिना जोड़ मुवमेट तकनीक को अपने रिकार्डस में शामिल किया है।
