— प्रो. अखिलेश त्रिपाठी
उच्च शिक्षा किसी भी समाज की बौद्धिक शक्ति का आधार होती है और शिक्षक उसकी आत्मा। इसलिए शिक्षकों के सम्मान, पदोन्नति और करियर उन्नति से जुड़े प्रश्न केवल कर्मचारियों के हित का विषय नहीं होते, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और समाज के भविष्य से भी जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश के राजकीय एवं सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के शिक्षकों को प्रोफेसर पदनाम दिए जाने का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बिहार सरकार ने वर्ष 2017 से ही पात्र महाविद्यालय शिक्षकों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के प्रावधानों के अनुरूप प्रोफेसर (लेवल-14) पदनाम देने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी थी। उत्तराखंड ने भी वर्ष 2019 में इस दिशा में कदम बढ़ाया। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में यह व्यवस्था वर्ष 2021 में लागू हुई। परिणामस्वरूप प्रदेश के हजारों शिक्षक लगभग चार वर्ष तक उस पदनाम और उससे जुड़े शैक्षणिक एवं व्यावसायिक लाभों से वंचित रहे, जिसके वे वास्तविक रूप से अधिकारी थे।
यह समझना आवश्यक है कि प्रोफेसर पदनाम केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह शिक्षक के शैक्षणिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक माना जाता है। वर्षों के अध्यापन अनुभव, शोध कार्य, शोध-पत्रों के प्रकाशन, अकादमिक योगदान तथा कठोर मूल्यांकन प्रक्रिया के बाद कोई शिक्षक इस स्तर तक पहुँचता है। ऐसे में यदि समान योग्यता और समान पात्रता रखने वाले शिक्षकों को एक राज्य में समय पर यह अवसर मिले और दूसरे राज्य में वर्षों बाद, तो स्वाभाविक रूप से असमानता की भावना उत्पन्न होती है।
उत्तर प्रदेश के महाविद्यालयों में कार्यरत हजारों एसोसिएट प्रोफेसरों ने भी वही योग्यताएँ प्राप्त की थीं जो बिहार अथवा अन्य राज्यों के शिक्षकों ने प्राप्त की थीं। उन्होंने पीएच.डी. की, शोध प्रकाशित किए, विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया और उच्च शिक्षा के विकास में अपना योगदान दिया। इसके बावजूद उन्हें प्रोफेसर पदनाम प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत स्तर पर निराशाजनक थी, बल्कि इससे पूरे उच्च शिक्षा तंत्र में उत्साह और प्रेरणा पर भी प्रभाव पड़ा।
इस विषय का एक संवैधानिक पक्ष भी है। भारतीय संविधान का मूल भाव समानता और समान अवसर है। जब राष्ट्रीय स्तर पर UGC समान मानदंड निर्धारित करता है, तब उन मानदंडों के अनुपालन में अत्यधिक विलंब शिक्षकों के बीच अवसरों की असमानता उत्पन्न कर सकता है। विशेष रूप से तब, जब अन्य राज्यों में वही व्यवस्था पहले से लागू हो चुकी हो।
शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला कर्मचारी नहीं होता। वह शोध, नवाचार, बौद्धिक नेतृत्व और नई पीढ़ी के निर्माण का वाहक होता है। जब उसे उसके योगदान के अनुरूप सम्मान और पदोन्नति मिलती है, तब उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और वह शिक्षा व्यवस्था को और अधिक समृद्ध बनाता है। प्रोफेसर पदनाम मिलने से शिक्षकों में शोध गतिविधियों, अकादमिक नेतृत्व तथा संस्थागत विकास के प्रति नई ऊर्जा का संचार होता है। इसका सीधा लाभ विद्यार्थियों और समाज को मिलता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस विषय को केवल प्रशासनिक निर्णय के रूप में न देखा जाए। यह उच्च शिक्षा के विकास, शिक्षकों के मनोबल और समान अवसर के सिद्धांत से जुड़ा प्रश्न है। यदि बिहार में वर्ष 2017 से और उत्तराखंड में वर्ष 2019 से यह व्यवस्था लागू हो सकती थी, तो उत्तर प्रदेश में भी इसे उसी अवधि से लागू करने पर गंभीर विचार होना चाहिए था। इससे न केवल शिक्षकों को न्याय मिलता, बल्कि प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को भी समय रहते उसका लाभ प्राप्त होता।
शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति केवल भवनों और बजट से नहीं होती; वह योग्य और प्रेरित शिक्षकों से होती है। इसलिए शिक्षकों के वैध करियर अधिकारों की रक्षा करना वास्तव में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में निवेश करना है। उत्तर प्रदेश के महाविद्यालय शिक्षकों को भी बिहार के समान वर्ष 2017 से प्रोफेसर पदनाम का लाभ मिलना चाहिए था। यह मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि न्याय, समानता और शैक्षणिक गरिमा की मांग है।
(लेखक उच्च शिक्षा एवं सामाजिक चिंतन से जुड़े अध्येता हैं।)
