प्रोफ़ेसर अखिलेश त्रिपाठी – वरिष्ठ प्राध्यापक
उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा व्यवस्था पिछले कई वर्षों से अनियमित शैक्षिक सत्र की समस्या से जूझ रही है। स्थिति यह है कि पांच-पांच सेमेस्टर बीत जाने के बाद भी अनेक विश्वविद्यालय अपने सत्र को नियमित नहीं कर पाए हैं। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें हर वर्ष जून की भीषण गर्मी और लू के बीच परीक्षा देने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2024 में सभी विश्वविद्यालयों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि हर हाल में 15 मई तक परीक्षाएं समाप्त कर ली जाएं। यह निर्णय छात्रहित में अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि उत्तर भारत में जून का महीना प्रचंड गर्मी, लू और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरों के लिए जाना जाता है। दुर्भाग्यवश अधिकांश विश्वविद्यालय इन निर्देशों का प्रभावी पालन नहीं कर पाए।
आज भी हजारों विद्यार्थी तपती दोपहरी में कई-कई किलोमीटर दूर से साइकिल अथवा अन्य साधनों से परीक्षा केंद्र पहुंचते हैं। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्र सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। किराए के छोटे कमरों में रहने वाले विद्यार्थियों के पास न पर्याप्त बिजली होती है और न ही शीतल वातावरण। ऊपरी मंजिलों के कमरे जून की गर्मी में भट्ठी जैसे हो जाते हैं। ऐसे में परीक्षा की तैयारी करना और मानसिक संतुलन बनाए रखना दोनों कठिन हो जाता है।
हर वर्ष समाचार आते हैं कि कई विद्यार्थी लू लगने से परीक्षा केंद्रों पर बेहोश हो गए। कुछ मामलों में तो विद्यार्थियों की मृत्यु तक हो जाती है। यह केवल प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं, बल्कि एक मानवीय संवेदनहीनता का प्रश्न भी है। वातानुकूलित कक्षों में बैठकर परीक्षा कार्यक्रम निर्धारित करने वाले अधिकारी शायद उस विद्यार्थी की स्थिति का अनुभव नहीं कर पाते, जो दोपहर की 45 डिग्री तापमान वाली सड़क पर परीक्षा देने निकलता है।
स्थिति की विडंबना यह है कि अंतिम वर्ष की लिखित परीक्षाएं होने के बाद भी विश्वविद्यालय समय पर प्रायोगिक परीक्षाएं, प्रोजेक्ट और मौखिकी परीक्षाएं आयोजित नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों के परिणाम देर से घोषित होते हैं और उन्हें उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
दूसरी ओर, मध्यवर्ती सेमेस्टरों की परीक्षाओं के लिए अभी तक कई स्थानों पर आवेदन प्रक्रिया भी पूर्ण नहीं हो सकी है। इससे स्पष्ट है कि वर्तमान गति से सत्र का नियमितीकरण निकट भविष्य में संभव नहीं दिखाई देता।
ऐसी परिस्थिति में आवश्यकता है कि सरकार व्यावहारिक और छात्रहितकारी निर्णय ले। मध्य एवं सम सेमेस्टर के विद्यार्थियों को पूर्ववर्ती विषम सेमेस्टर के आधार पर प्रोन्नत करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इससे न केवल विद्यार्थियों को असहनीय गर्मी में परीक्षा देने से राहत मिलेगी, बल्कि आगामी शैक्षिक सत्रों को भी समयबद्ध ढंग से नियमित किया जा सकेगा।
इसके साथ ही 1 जून से 15 जुलाई तक ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी और शिक्षक दोनों स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित रह सकें। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में यदि कोई विश्वविद्यालय 15 मई तक परीक्षाएं समाप्त न कर पाए, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और उचित कार्यवाही की जाए। उच्च शिक्षा केवल परीक्षा कराने का नाम नहीं है। यह विद्यार्थियों के जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ा विषय है। यदि व्यवस्था विद्यार्थियों की मूलभूत मानवीय परिस्थितियों को नहीं समझेगी, तो शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
