
चाह हटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ न चाहिए, वह है शहनशाह ॥
- ✍ किसी चीज की इच्छा/आकांक्षा उस चीज/वस्तु को पाने की चाहत पैदा करती है ।
✍ उस चाहत को पूरा करने के लिए, हम अपना सुख-चैन त्यागकर, उसको पाने का पुरजोर प्रयास करने लगते हैं ।
✍ किसी चीज को पाने की अत्यधिक चाहत ही दुख/कष्ट का मूल कारण है ।
✍जो इच्छाओं को अपने नियंत्रण/वश में कर लेता है, वह चिंतामुक्त रहता है और वह किसी राजा से कम नहीं है ।
✍बेकार की इच्छाओं/आकांक्षाओं का त्याग करके ही जीवन मे निश्चिन्त एवं आनंदित रहा जा सकता है । - आज तिथि 5124/09-01-10/06 युगाब्द 5124, मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी, शुक्रवार की पावन मंगल बेला में, इच्छाओं/आकांक्षाओ को नियंत्रित रखने के संकल्प के साथ, नित्य की भाँति,आपको मेरा “राम-राम” ।
