नई दिल्ली / लखनऊ , 11 जून , पुस्तक लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के महासचिव अतुल भाई कोठारी ने कहा कि इस विश्वविद्यालय ( South Asian University – SAU) ने मेरे सपने को पूर्ण व साकार रूप प्रदान किया है। ये कार्य का प्रारंभ कठिन होता है अतः रास्ता बनाना श्रम साध्य एवं समय साध्य होता है। सृजन का आनंद होता है।
एक वर्ष के कठिन परिश्रम के पश्चात् ये इन तीनों पाठ्यक्रमों के अंग्रेजी एवं हिंदी भाषा में कुल पांच पुस्तकों का लेखन पूर्ण हुआ। इन पाँचों पुस्तकों का लोकार्पण समारोह SAU के बोर्ड कक्ष में 8 जून 2026 को संपन्न हुआ। इस लोकार्पण समारोह में SAU ( South Asian University – SAU ) के समस्त वरिष्ठ प्रोफेसर, अधिष्ठाता गण एवं निदेशक गण उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विवेक दीक्षित ने किया। अतिथियों के द्वारा ज्ञान दीप प्रज्ज्वलन करके इस कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। जिसमें कार्यक्रम की विस्तृत भूमिका रजिस्ट्रार डॉ. आर. के. सोनी ने रखी।

मुख्य अतिथि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के महासचिव अतुल भाई कोठारी ने आगे कहा कि भाषा और संस्कृति एक दूसरे से अभिन्न हैं। हमारे संस्कार से संस्कृति बनी है। हजारों वर्षों से संस्कृति को संस्कृत भाषा ने पोषण दिया है। भाषा संस्कृति की संवाहिका होती है। भारत में अभी भी औपनिवेशिकता की मानसिकता है। अतः दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय ( South Asian University – SAU ) में संस्कृत ही क्यों इस प्रकार के प्रश्न कर सकते हैं। परन्तु वे विदेशी नही भारतीय ही करते रहते हैं। भाषा के माध्यम से स्वाभिमान का जागरण हो रहा है। उन्होंने कहा कि संस्कृत में जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते हैं । जैसे लिखते हैं वैसे ही बोलते हैं। हमारी सभी भाषाएँ समृद्ध हैं और इसको संस्कृत भाषा और समृद्ध करती है।

श्री कोठारी ने कहा कि भाषा के प्रति स्वाभिमान शून्यता खतरनाक है ‘भारतीय ज्ञान’ समस्या शुरू ही न हो इसके लिए उपाय देता है और समस्या आ ही जाए तो भी समाधान प्रस्तुत होता है। परन्तु बाहर का ज्ञान समस्या आने पर उसका समाधान का मार्ग देता है।
South Asian University – SAU : कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. के.के.अग्रवाल ने कहा कि आठ देशों के पारस्परिक सहयोग से चलनेवाला यह विश्वविद्यालय अनूठा है। परन्तु भारत में चलने के कारण इस विश्वविद्यालय की और हम सबों की जिम्मेदारी अधिक है। इस विश्वविद्यालय ( South Asian University – SAU ) ने दक्षिण एशियाई के विद्यार्थियों के लिए एक साथ भारत में बैठकर अध्ययन के लिए स्थान दिया। दक्षिण एशियाई भाषा की रोचकता के साथ-साथ शुद्धता का अत्यंत महत्त्व है। विशेषतः संस्कृत कंप्यूटर की तरह एक भी गलती स्वीकृत नही करती।
प्रो. अग्रवाल ने कहा कि विश्व में किसी भी देश की संस्कृति का नाम वहां की भाषा से जुड़ा नहीं। केवल भारत में ही इसकी संस्कृति से ही उस भाषा संस्कृत से कनेक्ट है। भारत के पास अपना एक विश्वविद्यालय है जो 15 वर्ष पूर्व बनाया गया। यह विश्वविद्यालय है जो जिओ पॉलिटिक्स से पृथक है और संस्कृत केवल भारत की भाषा नही अपितु विश्व की भाषा है। अतः संस्कृत एवं संस्कृति का अध्ययन होना ही चाहिए। सार्वभौमिक है भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत परस्पर जुड़ा है। संस्कृत भाषा और यहाँ की संस्कृति दोनों सार्क नेशन के लिए अमूल्य अवदान है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. विजय कुमार कर्ण ने कहा-कि भारतीय ‘भाषा परिवार’ समग्रता में एक ही है ; जिसका मूल संस्कृत भाषा है। जिस प्रकार भारतीय संस्कृति समग्रता में एक ही है परन्तु, वह अलग-अलग रूप में अनेकरूपतत्त्व वैविध्य का दर्शन कराती है। उसी प्रकार दक्षिण एशिया के सभी देशों की अपनी-अपनी भाषाएँ होने के बाद भी संस्कृत का इन सबों पर प्रभाव है। दक्षिण एशियाई भाषाओँ का यहीं पारस्परिक अन्तःसम्बन्ध उन्हें जोड़ता है। भाषाई आधार पर हम सभी दक्षिण एशिया देश एक दूसरे के अत्यंत सन्निकट हैं। प्रस्तुत पुस्तकें इन संबंधों को प्रगाढ़ करने में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशियाई विश्विद्यालय (South Asian University -SAU), नई दिल्ली में दक्षिण एशियाई भाषा संस्कृति केंद्र की संकल्पना को साकार करने के लिए डेढ़ वर्ष पूर्व संस्कृत एवं दक्षिण एशियाई ज्ञान परंपरा समिति का गठन किया गया। इस समिति में नव नालन्दा महाविहार विश्वविद्यालय नालन्दा के प्रो. विजय कुमार कर्ण, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. चान्द किरण सलूजा, दिल्ली विश्वविद्यालय के ही प्रो. रमेशचन्द्र भारद्वाज, गुवाहाटी विश्वविद्यालय असम, के प्रो. कामेश्वर शुक्ल एवं बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के डॉ. बिपिन कुमार झा को सदस्य बनाया गया था।
समिति के सदस्यों ने अथक गहन विचार विमर्श कर इस केंद्र के अंतर्गत तीन पाठ्यक्रम क्रमशः’प्रारंभिक संस्कृत भाषा परिचय’, ‘दक्षिण एशिया में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय परिदर्शन’ एवं ‘दक्षिण एशियाई भाषाओं का अन्तःसम्बन्ध’ की संकल्पना की जो साउथ एशियन विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं के लिए ओपन एलेक्टिव वैकल्पिक रूप विषय के रूप में चुनने के लिए तीन पाठ्यक्रमों को मूर्त रूप दिया। पुनः इस विश्वविद्यालय ( South Asian University – SAU ) के अध्यक्ष माननीय प्रो.के.के.अग्रवाल के निर्देशन तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के महासचिव अतुल भाई कोठारी को परामर्शानुसार इन तीनों ही पाठ्यक्रमों के लिए अध्ययन सामग्री पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की बात आई।
तदन्तर इन पुस्तकों का लेखन प्रारंभ हुआ। एक वर्ष के कठिन परिश्रम के पश्चात् ये इन तीनों पाठ्यक्रमों के अंग्रेजी एवं हिंदी भाषा में कुल पांच पुस्तकों का लेखन पूर्ण हुआ। इन पाँचों पुस्तकों का लोकार्पण समारोह SAU के बोर्ड कक्ष में दिनांक 8 जून 2026 को संपन्न हुआ। इस लोकार्पण समारोह में SAU के समस्त वरिष्ठ प्रोफेसर, अधिष्ठाता गण एवं निदेशक गण उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विवेक दीक्षित ने किया। अतिथियों के द्वारा ज्ञान दीप प्रज्ज्वलन करके इस कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। जिसमें कार्यक्रम की विस्तृत भूमिका रजिस्ट्रार डॉ. आर. के. सोनी ने रखी। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो. प्रणव महुरी जी, डॉ. बिपिन कुमार झा, डॉ. शैलेश श्रीवास्तव, प्रो. कविता खन्ना, प्रो. रीतू गुप्ता, सविता राणा आदि उपस्थित थे।
